Monday, January 26, 2015

ज़रा याद उन्हें भी कर लो

हाँ भाई आज 14 फ़रवरी है; मोहब्बत का दिन है। यूँ तो हर दिन मोहब्बत का है लेकिन पाश्चात्य संस्कृति ने यही सिखाया है की आज मोहब्बत का तमाशा बना दीजिये। तो हमने सोचा की हम भी .....

अपनी अपनी मोहब्बत है जनाब। एक उनको भी थी जो हँसते हँसते फांसी पर चढ़ गए थे। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की सज़ा के खिलाफ पं मदन मोहन मालवीय जी ने आज ही के दिन अपील की थी जिसे ख़ारिज कर दिया गया और 23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। उस दिन धरती से आकाश तक यही गीत गूंजा होगा...

"सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."

तो हुआ ना आज वतन से मोहब्बत का दिन। इसी बात पर आज की उस नौजवानी को थोड़ा सा आईना दिखा दूं जो गुलाबों में उलझ कर रह गई है या जिनकी मौसमी देशभक्ति बस भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में देखने को मिलती है...

मखमली हाथों में तकदीर-ए-मुल्क है जनाब
कौन रखेगा यहाँ खून-ए-शहीद का हिसाब ।

है पशेमां सरज़मीं भी नौजवाँ-ए-हिंद से
हाथ में शमशीर नहीं, लिये खड़े हैं गुलाब ।

बिक गई रात हुस्न-ए-मेहताब के हाथ यूँ
बुझ गये चिराग खुद और छुप गया आफताब।

भूल गई माहज़बीनें, हाड़ी रानी के किस्से
शहादत का रास्ता रोक रहा हुस्न-ओ-शबाब ।

रोशनी हो तो कैसे तीरगी से रूबरू
चश्म-ए-जुगनु में कहीं, ज़िंदा नहीं कोई ख्वाब ।

खामोश हो गई ज़ुबां-ए-कलम इस दौर में
रग-ए-जवां बहता नहीं अब बिस्मिल सा इंकलाब ।।

© - प्रशांत सेठ

पशेमां = शर्मिन्दा, शमशीर = तलवार, हुस्न-ए-मेहताब = चाँद का हुस्न, आफताब = सूरज, माहज़बीनें = नवयोवनायें, तीरगी = अँधेरा, चश्म-ए-जुगनु = जुगनू की आँख, रग-ए-जवां = जवानी की रगों में

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