गांधीवाद वास्तव में ऐसा दर्शनशास्त्र है जिसे स्वयं गांधी भी पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए, तो अनुयायियों से क्या अपेक्षा की जा सकती है। व्यवहारिक धरातल पर विफल यह दर्शन वास्तव में सफल था नहीं बल्कि सफल दर्शाया गया। और सरकारी संरक्षण प्राप्त होने के कारण इसे सफल दिखाने में कोई कठिनाई भी नहीं हुई।
गांधीवाद वास्तव में राजनीतिक दृष्टिकोण से सफलता का सूत्र है क्योंकि यह जनमानस के आक्रोश को ठंडा करके बहलाने फुसलाने के लिये सर्वोत्तम अस्त्र है। परंतु यह गांधीवाद राष्ट्रनीति के दृष्टिकोण से घातक है क्योंकि यह अन्याय अधर्म के प्रति विरोध की मानसिकता को समाप्त करके नपुंसकता उत्पन्न करता है। पिछले 70 वर्ष के इतिहास में इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।
गांधीवाद वही अर्जुन विषाद रोग है जिसका उल्लेख भगवद गीता के प्रथम अध्याय में मिलता है। शेष सत्रह अध्याय इस रोग के उपचार के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है की भगवद गीता एक उच्च कोटि का दर्शन है जिसके सामने गांधीवाद अत्यंत बौना और अव्यवहारिक दर्शन है।
गांधीवाद से प्रभावित वही लोग हैं जिन्होंने गीता का ठीक से अध्ययन नहीं किया है। ये वही लोग हैं जो किसी भी दर्शन की दूर से उपासना तो करते हैं परंतु आत्मसात करने का लेशमात्र भी प्रयास नहीं करते। यही कारण है कि दिखावे के लिए गाँधी के अनुयायी तो लाखों मिल जाएंगे, परंतु आधी धोती पहनकर भौतिक महत्वकांक्षाओं का त्याग करते इनमें से कोई नहीं दिखता है। वहीं एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने वाले केवल मुन्नाभाई ही मिले, वो भी फिल्मी पर्दे पर।
यदि किसी दर्शन को आत्मसात करने का प्रयास निष्ठापूर्वक किया जाए तभी उसके व्यवहारिक गुण दोष प्रकट होंगे। परंतु दुर्भाग्य से अधिकांश लोगों ने गांधीवाद की सिर्फ उपासना की है, जीवन में प्रतिष्ठित करने की चेष्टा नहीं की। तभी तो यह किसी के आचरण में परिलक्षित नहीं होकर केवल कुछ शातिर लोगों का अपनी कायरता एवं हृदय की कालिमा को ढाँकने का लबादा मात्र बनकर रह गया है। वहीं जिन गिनती के लोगों ने गांधीवाद को आत्मसात करने का साहस किया है, उन्हें इस दर्शन के व्यवहारिक दोष शीघ्र ही समझ में आ गए। उदाहरण के लिए सरदार पटेल, नेताजी, इत्यादि। जिन लोगों में स्वाध्याय का स्वभाव नहीं था वो गांधीवाद को निष्ठापूर्वक ढोते रहे हैं और परिणामस्वरूप कुंठित, असफल और भ्रमित जीवन जीकर निकल गए; परंतु स्वाध्याय की कमी के चलते कुंठा और असफलता का कारण अपने भीतर नहीं ढूंढ पाए। ज्ञात रहे कि स्वाध्याय के अभाव में व्यक्ति अपनी असफलताओं का दोष परिस्थितियों पर अथवा दूसरों पर मढ़ने की प्रवृत्ति अपना लेता है और वास्तविक कारण को नकार देता है। जबकि भगवद गीता के सिद्धांतानुसार व्यक्ति अपने स्वयं के कर्म फल ही भोगता है, किसी अन्य के नहीं।
राजनीतिक प्रपंच के चलते आज गांधी के विरोध को लोग गोडसे का समर्थन सिद्ध करने लगते हैं जिसकी वजह से एक ऐसे माहौल का निर्माण हुआ है कि लोग खुलकर गांधीवाद के दोषों पर चर्चा करने से बचते हैं। मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि गांधीवाद का विरोध यानि गोडसे का समर्थन कदापि नहीं है, वरन् श्रीकृष्ण के गीता दर्शन का समर्थन है।
अहिंसा परमो धर्म:
धर्म हिंसा तथैव च
- प्रशांत सेठ