Monday, October 30, 2017

त्वम् ब्रह्मास्मि

तुमने देखा होगा
दर्पण को
कई बार तुम पर
मुस्कुराता है
और कई बार करता है
क्रोध भी
फिर तुमने जाना
अपना कोई रंग नहीं होता
दर्पण का
बिम्ब के बिना नहीं होता
प्रतिबिम्ब
मुस्कान भी तुम्हारी थी
क्रोध भी तुम्हारा था

तुम्हारा संसार भी तो
दर्पण ही है
तुम्हारे अपने मन का
परिस्थिति है
तुम्हारी मनःस्थिति का ही
प्रतिबिम्ब
कभी देखना
दृष्टि हटाकर इस दर्पण से
खुद की तरफ
तुम्हारे हर प्रश्न का उत्तर
छुपा है
तुम्हारे ही भीतर

तुम्हीं ने गढ़ा है ये संसार
इच्छाओं का
यहाँ तक की गढ़ लिया
परलोक भी
पारलौकिक इच्छाओं से
गढ़ लिया अपनी
अपूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने का
एक साधन
और नाम दिया उसको
ईश्वर
जब तक शेष है तुम्हारा
जीवत्व
तब तक रहेगा अस्तित्व
ईश्वर का भी
और तब तक करनी होगी
प्रार्थना भी

मत करना
प्रार्थना विचार चिंतन अध्ययन
उस दिन
हट जाये जिस दिन
मन के समक्ष से
संसार का दर्पण
लीन हो जाये
तुम्हारे भीतर की मीरा
किसी कृष्ण में
तुम्हारा जीव हो जाये
एकात्म
उस ब्रह्म से
निराकार निर्गुण अनाम

© - प्रशांत सेठ

Saturday, September 30, 2017

संस्कार माला - II

बेटी सिद्धि सेठ के जन्मदिन पर अनेक शुभकामनाओं और आशीष सहित पिता का प्रेमपूर्ण उपहार।

जीवन में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों और मनःस्थितियों में, पौराणिक चरित्रों से प्रेरणा लेने की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुये, संस्कारों की माला का द्वितीय भाग।

जब
घोर तप अर्जित विद्या से हो शक्ति सबल
और ह्रदय में हो तुम्हारे श्रद्धा भक्ति अटल
जीवन स्वयं ले आये तभी विष का प्याला
माँग ले अंगुष्ठ ही जब हाथ थामने वाला
तब समझ लेना
बनके याचक यदि स्वयं श्रद्धेय खड़ा है
हे एकलव्य,
नियति का हेतु निज सर्वस्व से बड़ा है
_______________

जब
तिरस्कृत सा पाओ स्वयं को संसार में
एकाकी जीवन हो बियाबान उजाड़ में
चख लिये हों स्वाद तुमने जीवन के सारे
खट्टे, मीठे, तीखे, कड़वे और खारे
तब समझ लेना
निज ह्रदय में राम का होगा निवास
हे शबरी,
मन कुटी में शेष रहे केवल मिठास
_______________

जब
आस पास अज्ञानमय अँधेरा घना हो
असत्य के शोर में सत्य कहना मना हो
पा जाओ ऐसे में कभी ज्ञान का वो धन
करा सको दृष्टिहीनों को सत्य का दर्शन
तब समझ लेना
अंधत्व की संतान को मिली दृष्टि है
हे श्रवण,
कोई आशा रखती तुमसे स्वयं सृष्टि है
_________________

जब
मिल जाये कभी राजपाट तुम्हें भाग्य से
मन विह्वल रहे किन्तु भीतर वैराग्य से
बहते हों नयन तुम्हारे पर-पीड़ा के कारण
वाणी करती हो औरों के दुःख का निवारण
तब समझ लेना
ह्रदय करुणा से जिसका भी शुद्ध हुआ है
हे सिद्धार्थ,
उसी के भीतर उदय कोई बुद्ध हुआ है
__________________

जब
स्वार्थ की मंथरा बुद्धि पर दुष्प्रभाव करे
ह्रदय से गमन तुम्हारे निर्मल भाव करे
विवेक और मर्यादा को देकर निष्कासन
परिस्थिति सजाये तुम्हारे लिये सिंहासन
तब समझ लेना
बुद्धि रहे अधीन, जीवन भाव प्रधान रखना
हे भरत,
ह्रदय अयोध्या का राजा सदैव राम रखना
____________

जब
अस्तित्व पर घोर संकट की घड़ी हो
दरिद्रता समक्ष तुम्हारे द्वार खड़ी हो
मन विहल, भविष्य की चिंता लगे सताने
झोली में शेष हों तुम्हारी मुट्ठी भर दाने
तब समझ लेना
जो कुछ है पास वो भी कर देना अर्पण
हे सुदामा,
पाया है उसीने जिसने किया समर्पण
____________

जब
रिसती पीड़ा हो ह्रदय के घाव से
उपजती कटुता हो मन के भाव से
धधकती हो ज्वाला भीतर क्रोध की
बलवती हो इच्छा जब प्रतिशोध की
तब समझ लेना
ज्ञान शक्ति विफल, लक्ष्य दुश्वार है
हे अश्वत्थामा,
"मैं" के अश्व पर तुम्हारा मन सवार है
_______________

जब
निज कौशल पर होने लगे तुम्हें अभिमान
अधर्म की सभा में पाने लगो तुम सम्मान
अहंकार होता हो बलवान पाकर कुसंग
चन्दन से आकर लिपटते हों भुजंग
तब समझ लेना
अधर्म पराजित है सदा धर्म के प्रहार से
हे कर्ण,
बँध मत जाना किसी अधर्मी के उपकार से
___________________

© - प्रशांत सेठ

(प्रथम भाग संस्कार माला http://prasantseth.blogspot.com/2017/01/blog-post_11.html)

Tuesday, September 12, 2017

भक्ति विज्ञान

एक वस्तु
वस्तु पर पड़ती
श्वेत प्रकाश की किरणें
उन किरणों में छुपे
इंद्रधनुष के सात रंग
कुछ रंग हो जाते हैं अवशोषित (absorb)
कुछ परावर्तित (reflect)
वस्तु देती है आभास
उसी परावर्तित रंग में रंगे होने का
जो लौट कर आता है
तुम्हारी आँखों तक
कुछ ऐसा ही पढ़ा था
भौतिकी में
प्रकाश का विज्ञान
जो रंग कभी था ही नहीं
दृश्य का
वही समाहित हुआ आकर
तुम्हारी दृष्टि में

मन
मन में भाव
भावों के अनेक रंग
मन का प्रकाश जब पड़ता है
समाज पर
लौटा देता है समाज भी
घृणा, वैमनस्यता अथवा प्रेम के
वही रंग
जो रहते हैं समाहित
तुम्हारी दृष्टि में
इन्हीं रंगों में ढूँढ़ते हो तुम
जब अपने इष्ट को
दिखायी पड़ता है वो भी
मन के रंग में रंगा हुआ
कदाचित इसीलिये
जो दिख रहा है वो
सत्य नहीं है
हरा भी, तुम्हारी दृष्टी
भगवा भी, तुम्हारा ही मन

तुमने ये भी पढ़ा होगा
जो वस्तु कर लेती है समाहित
सारे रंग
प्रतीत होती है उसमें
कालिमा
जैसे अथाह अंतरिक्ष
और जिसपर नहीं ठहरता
कोई रंग
वो दिखती है श्वेत
जैसे कोरा कागज
मन का हर भाव
जब ठहर जाता है इष्ट पर
वो समेट लेता है खुद में
तुम्हारी कालिमा
और शेष रह जाती है इधर
केवल उज्ज्वलता
प्रकाश से भिन्न नहीं होता
भक्ति का विज्ञान

इसी में छुपा है शायद
उस सनातन प्रश्न का उत्तर
राधा क्यों गोरी,
वो क्यों काला??

© - प्रशांत सेठ

Sunday, September 3, 2017

एक सिकंदर - मन के अंदर

मैं देखता हूँ
अहंकार के अश्व पर सवार
श्रेष्ठता की दौड़ में संलग्न
बहुत सी भेड़ों को
इन भेड़ों की मैं मैं से
जन्मता एक जादूगर
जो दिखाता है
एक गुमनाम चिट्ठी
चिट्ठी किसी अनाम ईश्वर की
जो आयी है
सिर्फ और सिर्फ उसके पते पर
चिट्ठी जिसमें है पैगाम
दुनिया भर की भेड़ों के लिये
के तुम्हें करना है शासन
दूसरी भेड़ों पर
और फिर एक दिन यही भेड़ें
खो देती हैं अपनी पहचान
और बन जाती हैं
भेड़िया

मैं फिर देखता हूँ
इन्द्रियों के अश्व से सुसज्जित
देह के रथ पर सवार
कुछ और भेड़ें
इच्छाओं के बियाबान जंगल में
भटककर
जब तलाशती हैं रास्ता
तब धीरे से कोई बाबा
पकड़ा देता है
चमत्कार का झुनझुना
भेड़ें चल देती हैं उसके पीछे
और फिर जन्मता है
एक ऐसा ईश्वर
जो साध्य नहीं होता
बल्कि होता है साधन
इच्छाओं की पूर्ति का
और भेड़ें,
फिर भटक जाती हैं

मैं जानता हूँ
जहाँ भीड़ है वहाँ
खो जाती है
मंजिल खुद ही
मैं लौट पड़ता हूँ
इन रास्तों से उलट
एक ऐसी राह पर
जहाँ मिलते हैं
कुछ एकाकी राही
वो नहीं पकड़ाते कोई झुनझुना
नहीं दिखाते कोई चिट्ठी
मगर
बता देते हैं इशारों से
आगे की राह
मैं चल पड़ता हूँ निश्चिन्त
इस अनजान मगर
सुनिश्चित राह पर

अब मैं किसी को
हराना नहीं चाहता
चाहता हूँ जीत लेना
बस खुदको
मैं जान गया हूँ
एक बूँद ज्यों नकार बैठे
समंदर का अस्तित्व
ऐसे ही भूल गयी थी
ये मन की भेड़
अपने ही उस
अनंत विस्तार को
जिसका नाम...?
कुछ भी हो
अब फर्क नहीं पड़ता

© - प्रशांत सेठ

Friday, August 4, 2017

कुटुम्ब

मैं देखता हूँ जब भी
ऊँचे खड़े, हरे भरे
आसमान छूते वृक्ष को
मैं नाप लेता हूँ
उसकी जड़ों की गहराई
मैं जानता हूँ
परिवार रुपी वृक्ष का एक अंश
जब सहर्ष स्वीकार लेता है
नीचे की ओर बढ़ना
तब चूम पाती हैं अन्य टहनियाँ
सफलता का आकाश

इस वृक्ष पर जब देखता हूँ
खिलते पुष्प और पल्लव
लहलहाते रसीले फल
मैं ढूँढता हूँ
मिट्टी में गहरे दबे
उस बीज को
जिसने स्वीकार किया था
प्रेम में स्वयं टूट कर
औरों को जीवन देना
मैं देखता हूँ
उस बीज का अस्तित्व
फलते फूलते वृक्ष के
रोम रोम में

मैं जानता हूँ
प्रतिभा और सफलता के बीच
होती है एक महीन सी रेखा
दायित्व की
इस रेखा के उस पार
होता है एक अवसर
सबको छोड़कर
स्वयं आगे बढ़ जाने का
नहीं लाँघ पाते, बड़े लोग
ये छोटी सी रेखा
और रह जाते हैं गाँव में
घर के प्राचीन अवशेष
और माँ बाबूजी की
विरासत को सम्हालने
गाँव के टूटे घर में दफ़न
इन्हीं छोटे छोटे बीजों से
उगते हैं
तुम्हारे शहर के बड़े बड़े मकान

फिर से देखो
इस बार मेरी दृष्टि से
तुम्हारी जमीन के नीचे मिलेंगी
कुछ गुमनाम जड़ें
जिन्होंने
धरती का सीना फाड़कर
तुम्हें पहुँचाया आकाश तक
एक बेनाम बीज
जिसकी छाती भेदकर
तुमने पाया है जन्म
तुम्हारे पैरों के नीचे मिलेंगे
वो मजबूत काँधे
जिन्होंने उठा रखा था
तुम्हारे हिस्से का दायित्व

संघर्ष के दिनों में
तुम्हारे काँधों पर नहीं था
कोई बोझ
सिवाय खुद के
अब
जब तुम चमकते हो
सफलता के आकाश में
प्रसिद्धि के सूर्य समान
और सुनाते हो अपनी
सफलता के किस्से
तब
मैं तुमसे करना चाहता हूँ
एक सौदा
तुम अपनी जड़ों को कभी
असफल मत कहना
मैं भी तुम्हें
खुदगर्ज़ नहीं कहूँगा

© - प्रशांत सेठ

Thursday, August 3, 2017

मातृ स्वरुप दादा भैया मामा को विनम्र श्रद्धांजलि

जब जब ह्रदय मथा है मैंने
तब तब अधर लगे कुछ कहने
जब जब अधर सिये हैं मैंने
तब तब नयन लगे हैं बहने
मत अधरों को रोको
मत नयनों को बहने दो
आँसू हैं श्रृंगार ह्रदय का
ह्रदय में रहने दो

- श्री प्रभात नीखरा

प्रिय मामाजी श्री प्रभात नीखरा जी "दादा भैया" की उपरोक्त पंक्तियाँ उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय देती हैं। संघर्ष और टूटन से सृजन करना प्रकृति की विशेषता होती है। जब एक बीज कहीं गहरे मिटटी में दब कर टूटता है, तब उसमें सम्पूर्ण मानवता को पोषित करने की क्षमता निखर कर बाहर आती है। ऐसा भी कह सकते हैं कि अपनी टूटन को सृजन में परिवर्तित कर देने का गुण जिसमें होता है, प्रकृति ऐसे व्यक्तित्व को ही सृजन का दायित्व सौंपती है।

मैं समझ सकता हूँ प्रकृति ने दादा भैया को परिवार की नींव बनने के लिये क्यों चुना। संघर्ष उसी के हिस्से में आता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं और जो आगे बढ़ कर स्वयं दायित्व उठाता है। भाई का पद तो जन्म से प्राप्त हो जाता है परंतु घर का दादा भैया होने के लिये कर्तव्यनिष्ठा के साथ साथ त्याग, धैर्य और प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय की आवश्यकता होती है। कदाचित इसलिये मामाजी अपने घर के बड़े भाई ही नहीं, "दादा भैया" थे। उनके दिये हुये संस्कार और चिंतन के बीज ने आज एक दो नहीं, सैंकड़ों वृक्ष को इतनी गहरायी दी है कि वो सभी अपने अपने स्थान पर खड़े होकर आकाश को चुनौती दे रहे हैं। कल उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हज़ारों लोगों की आँखों में अश्रुधारा इस बात का द्योतक थी के दादा भैया की स्मृतियाँ हम सभी के ह्रदय में सदा पुष्पित और पल्लवित होती रहेंगे।

यदि मामा शकुनि हो तो भांजे का दुर्योधन होना निश्चित है। यदि मामा कंस हो तो भांजा कृष्ण ही होगा। परंतु यदि मामा स्वयं कृष्ण हो तब?
तब अभिमन्यु का जन्म होता है। मेरे जीवन की प्रेरणा, व्यक्तित्व के निर्माता और कवि मन को जागृत करने वाले प्रिय मामाजी को मेरी श्रद्धापूर्ण भावांजलि।

- प्रशांत सेठ

Wednesday, July 19, 2017

कविता - चित्त के चेहरों सी

ह्रदय भाव लहरों सी
धूप सर्द दोपहरों सी
मन दर्पण में छवि अपनी
फिर भी लगती गैरों सी
कविता चित्त के चेहरों सी

ह्रदय ह्रदय बहती जाये
करुणा की फसल उगाये
मन के तटबंध तोड़ चल दे
जो बरसाती नहरों सी
कविता सरित लहरों सी

हाय पैसा हाय पैसा
जीवन ऊँची बिल्डिंग जैसा
इनके बीच ऊग आती ज्यों
झोपड़ पट्टी शहरों सी
कविता गाँव के चेहरों सी

मन पंछी सी आतुरता
विस्तृत नभ सी व्यापकता
सपनों को पंख लगे पर
यथार्थ बेड़ियाँ पैरों की
कविता गूंगे बहरों सी

काव्य रंग में कितना रंगें
मन की ये अल्हड़ उमंगें
वो जैसे बेपरवाह जवानी
कविता सयाने पहरों सी
कविता बुजुर्ग महरों सी

© - प्रशांत सेठ

महर = पूज्य और श्रेष्ठ व्यक्ति

Saturday, June 24, 2017

दलित पुराण

भाईसाहब! ये दलित क्या होता है?
जिज्ञासु मन ने हमेशा की तरह
अपना प्रश्न दागा
मैं उठकर वहाँ से भागा
लेकिन क़ानून की तरह हाथ बढ़ाकर
उसने मुझे पकड़ लिया
आज फिर इस व्यंगकार को
सनातन प्रश्न ने जकड़ लिया

मैं समझ गया, अब ये पूछेगा
ये कौन सा जातिगत गणित है?
एक संपन्न राज्यप्रमुख क्यों
आज भी दलित है?
फिर पूछेगा सवर्ण की पत्नी क्यों
दलित की तरह प्रचलित है?
इस दलित मंत्र से सत्ता
कैसे होती फलित है?
मैंने कहा सुनो,
तर्क सिद्धांत में नहीं मिलेगा
तुम्हारे प्रश्न का निराकरण
दलित अवस्था नहीं, जाति है
राजनीति का अलग है व्याकरण

दलित यानि
युगों तक शोषण का पर्याय
त्रेता से कलयुग तक जिसका
नहीं मिल सका उपाय
शबरी के जूठे बेर
कोई राम कितने भी खा ले
केवट के पवित्र भाव में
चरण नहीं, समस्त देह डुबा ले
लोकतंत्र के मस्तक पर ये निशान
पुरानी चोट का है
और बना रहेगा युगों तक क्योंकि
मामला वोट का है

दलित अर्थात
एकलव्य का अंगुष्ठ अर्पण
वर्ण के समक्ष
प्रतिभा का आत्मसमर्पण
द्वापर में एक युवराज ने
शोषण का प्रतिकार किया था
सूतपुत्र कर्ण को जब
अंगराज स्वीकार किया था
तभी से आरक्षण का
यह सिद्धांत चलन में है
राष्ट्रप्रमुख की प्रतिभा नहीं
योग्यता उसके दलन में है

दलित यानि
अपने आप में एक उपलब्धि
वैसे भी यहाँ
प्रतिभा की कीमत कब थी
इस शब्द में छुपा है
उनके पुरखों का संघर्ष
और पीढ़ियों की बढ़ती सम्पन्नता
वर्ष दर वर्ष
पुरखों के शोषण का लाभ
अब तक ले रहे बच्चे हैं

लगे रहने दो स्वाभिमान पर

ये दाग तो अच्छे हैं

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 16, 2017

दीवारें

दीवारें जब होती हैं
अपने शैशव में
तब टिकी होती हैं
ग़लतफ़हमियों की नींव पर
खड़ी होती हैं
अहंकार की सीमेंट से
स्वार्थ की ईंटों को जोड़कर
और इस तरह बँट जाता है
"हम" का आँगन
"मैं" और "तू" में
इन दीवारों में होता है
एक दरवाजा सम्भावना का
जिसके दोनों तरफ
सदभावना की कुण्डी में
लटकते हैं घृणा के ताले
दीवारें गुमा देती हैं
चाबी प्रेम की
दीवारें नासमझ होती हैं
रिश्तों के दरमियाँ

दीवारें जब
बड़ी हो जाती हैं
सियासत की गोद में
तब इस पार से उस पार
नहीं बहतीं
सौहाद्र की हवायें
नहीं सुनायी देतीं
"ह" और "म" को
एक दूजे के ह्रदय की धड़कन
बंद हो जाती हैं सदा के लिये
एहसास की खिड़कियाँ
और सम्भावना के दरवाजे
नफरत के मदरसे में
दीवारें जवाँ हो जाती हैं
मजहबों के दरमियाँ

दीवारें जब
और बड़ी हो जाती हैं
तो समझदार हो जाती हैं
तब खुल जाती हैं इनमें
कुछ विशेष खिड़कियाँ
और खुल जाते हैं कुछ दरवाजे
पिछली गली में
इन्ही दरवाजों से फिर
बेचीं जाती हैं कड़वाहटें
इन खिड़कियों में से
हाथ मिलाते हैं कुछ बड़े लोग
और घर ले आते हैं
मुनाफा
समझदार दीवारें व्यापार करती हैं
नफ़रतों के दरमियाँ

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, June 13, 2017

व्यंगबाण

हमारे व्यंगकार मित्र हैं शिरीष गोंटिया उर्फ़ उजड्ड जी। सत्य सिर्फ कड़वा ही नहीं उजड्ड भी होता है। ये अनुभव मैंने इनको देखकर ही प्राप्त किया है। इनकी महान सूक्तियों की व्याख्या करने का पुनीत कार्य मेरे जिम्मे है। अब देखिये ये तो सुबह सुबह का मॉर्निंग प्रवचन देकर निकल लेते हैं, परंतु भक्तों की जिज्ञासा को शांत करने के लिये व्याख्या मुझे करनी पड़ती है।

"व्यंग्यकार को शारीरिक रूप से पर्याप्त स्वस्थ होना चाहिए, आलोचक को कवि से अधिक कसरती होना चाहिये।"

- स्वामी उजड्डा नन्द

व्याख्या

बुद्धिजीवियों और संतों में एक बड़ा फर्क होता है। संतो के वचन व्यर्थ नहीं होते क्योंकि वो अनुभव की कोख से जन्म लेते हैं। जबकि बुद्धिजीवियों का ज्ञान टेस्ट ट्यूब बेबी की तरह नियंत्रित वातावरण में जन्म लेता है। बुद्धिजीवियों का ज्ञान यथार्थ के संघर्षों से मुक्त होकर जन्म लेता है और डार्विन के सिद्धांत को मुँह चिढ़ाकर; युगों तक जीवित रहने के उद्देश्य से, जीवन में नहीं सिर्फ किताबों में उतरना चाहता है।

स्वामीजी कहते हैं की व्यंग और आलोचना के शब्दबाण दूर से ही चलाये जाने चाहिये। धनुष की प्रत्यंचा को तान कर बाण छोड़ने के लिये, लक्ष्य से एक न्यूनतम दूरी रखना आवश्यक होती है। लक्ष्य जब करीब होता है तो धनुर्धारी को स्वयं उससे दूर जाकर वार करना चाहिये, वरना धनुष को त्याग कर मल्लयुद्ध की योग्यता भी रखनी चाहिये। इतिहास साक्षी है कि महारानी द्रौपदी द्वारा छोड़े गये व्यंग्यबाण की अंतिम परिणीति भीमसेन और दुर्योधन का मल्लयुद्ध ही था।

सर्वविदित है कि धनुर्धारी की वीरता का आँकलन उसके लक्ष्य की शक्ति से किया जाता है। अत: ये निश्चित है की सफल व्यंगकार अथवा आलोचक का लक्ष्य सदैव तगड़ा और समर्थ होना चाहिये। आपकी हैसियत हो ना हो, थलसेनाध्यक्ष को गरिया देने मात्र से आप एक सफल आलोचक की पदवी प्राप्त कर सकते हैं। व्यंगविधा में पारंगत स्वामी उजड्डा नन्द जी अपने अनुभव से बताते हैं कि जब बाण निशाने पर लगता है तो ताली बजाने वाले असंख्य प्रशंसक होते हैं। परंतु जब व्यंगकार रुपी द्रौपदी की मर्यादा अथवा आलोचक रुपी शिशुपाल का जीवन खतरे में पड़ता है, तब आज के युग में कोई भीमसेन अथवा दुर्योधन मदद के लिये आगे नहीं आता। तब माफ़ी माँगते हुये बयान भी वापस लेना पड़ जाता है। अतः व्यंगकार और आलोचक का शारीरिक रूप से स्वस्थ और कसरती होना भी उतना ही अनिवार्य है।

भक्त वत्सल स्वामी उजड्डा नन्द जी की प्रेरणा से ही मार्क ज़करबर्ग, आदि ने मुख पुस्तक, वॉट्सएप्प, ट्विटर आदि का सोशल प्लेटफार्म तैयार किया। इस मंच पर चढ़कर छोटे से छोटा धनुर्धारी भी बड़े से बड़े लक्ष्य पर, दूर से ही निशाना साध सकता है। प्रशंसकों के लाइक्स की गिनती करके स्वयं को स्थापित व्यंगकार भी घोषित कर सकता है। परंतु आभासी दुनिया के अपने दुष्परिणाम भी होते हैं। सोशल मीडिया पर निरंतर अभ्यास के चलते व्यंगकार और आलोचकों के अंगुष्ठ के अतिरिक्त शेष शरीर दुर्बल ही रह जाता है। तब मल्लयुद्ध की योग्यता उनमे नहीं रह जाती। अतः ऐसे अंगुष्ठबली वीरों के लिये स्वामीजी सलाह देते हैं कि वे सोशल मीडिया से बाहर आने का प्रयास ना करें। प्रशंसकों के प्रलोभन अथवा विरोधियों की ट्रॉलिंग के प्रति समदर्शी भाव रखें और इस मायाजाल में ना फँसें।

संतों में एक विशेष गुण ये भी होता है कि उनकी कथनी और करनी एक होती है। उनका आचरण भी उनके व्याकरण के अनुरूप ही होता है। स्वामी उजड्डा नन्द जी के प्रिय मित्र हैं सत्येंद्र रावत जी। स्वामीजी उनपर और उनकी काल्पनिक राजनीतिक पार्टी पर निशाना साध के निरंतर अभ्यास (नेट प्रैक्टिस) करते रहते हैं। रावत जी के कसरती शरीर को ध्यान में रखते हुये, स्वामीजी ने वॉट्सएप्प से बाहर दर्शन ना देने की कसम खा रखी है। स्वामीजी के व्यंगबाणों के कायल बहुत से प्रशंसकों और घायल बहुत से विरोधियों को आज तक उनके दर्शन नसीब नहीं हुये। यहाँ तक की अपने प्रिय शिष्य प्रशांत सेठ जी को भी उन्होंने बहुत दिनों से, अपने दर्शनों से वंचित रखा है। ऐसे संतों को नमन करने से हमारा और आपका जीवन धन्य हो जाता है।

तो बोलो व्यंग शिरोमणि, आलोचना वीर, दर्शन दुर्लभ श्री श्री 1008 स्वामी उजड्डा नन्द जी की जै

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 9, 2017

मेरे देश की धरती

हवा में उड़ता हुआ
एक पत्थर आया
मेरी कॉर्पोरेट सरकार के
शीशे से टकराया
फिर धूल झाड़कर उठा
हौले से मुस्कुराया
पूछा तो परिचय उसने
कुछ यूँ बताया
खेत से उठता एक
सियासी तूफान हूँ
भाईसाहब, मैं कर्ज में दबा हुआ
देश का किसान हूँ

बोला, आप जानते हैं
किसान क्या होता है?
वही जो धरती के सीने पर
श्रम का हल होता है
आज की भूख दबाकर
कल की रोटी बोता है
फिर पसीने से उसे सींचकर
अच्छे दिन की बाट जोहता है
उम्मीद की टूटी खाट पर
जागता ना सोता है
और फसल आने पर पहले से
ज़्यादा गरीब होता है

हम कलमकारों की नीयत
हमेशा साफ़ होती है
हमारी मासूमियत भरी जिज्ञासा
हरदम माफ़ होती है
बुद्धिजीवियों के सवाल
बड़े पवित्र रहते हैं
इस बात को कोई और नहीं
स्वयं बुद्धिजीवी कहते हैं
मैंने डरते डरते पूछा
क्या आप और वो आपस में
रिश्तेदार सगे हैं?
जो पत्थर कश्मीर से आकर
दिल्ली को लगे हैं?

बोला, वो भी एक प्रकार के
परिश्रमी किसान हैं
फर्क इतना है कि उनके
भरे हुये खलिहान हैं
जिन्होंने देश की छाती पर
बँटवारे का हल चलाया है
जनमानस के ह्रदय में
नफरत का बीज लगाया है
सींचने के नाम पर
मासूमों का खून बहाया है
आज उनके परिश्रम से देखो
आतंकवाद लहलहाया है

सियासत ही हम दोनों को
जन्म देती आयी है
आपने ठीक पहचाना
वो मेरा सगा भाई है
आज उसी की प्रेरणा से
हम देश को जला रहे हैं
भोपाल से दिल्ली तक
किसी का रास्ता बना रहे हैं
अभी तो बहुत से मगरमच्छ
अश्कों की गंगा में बहायेंगे
हमारे काँधों पर चढ़कर
राजधानी तक जायेंगे
और हम जहाँ खड़े हैं वहीँ
खड़े खड़े मर जायेंगे

शास्त्रीजी ने हम को
जय किसान कहा था
तब किसान का ये अर्थ
किसी को पता कहाँ था?
हिंसक औलाद जनने से
एक माँ भी डरती है
शायद इसलिये आज बाँझ
हो चली ये धरती है
अपनी भूमि छोड़कर
पलायन को मजबूर है
गाँव का किसान आज
शहर में मज़दूर है

मैं सोच रहा हूँ,
हर उफान के पीछे
एक पीड़ा होती है
और हर पीड़ा पर इस देश में
राजनीतिक क्रीड़ा होती है
क्योंकि सियासत की दुनिया में
ये सिद्धांत खूब चलता है
फिर नहीं ऊगता वो सूरज
जो एक बार ढलता है
वो दिल्ली के मेले में गुम
होने से डरती है
सियासत तभी तो उन्माद का
हाथ थामकर चलती है

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 2, 2017

त्रिशंकु

राख में दबी दबी सी
इक चिंगारी क्यों है?
तू अगर वैरागी है तो
मन संसारी क्यों है?

जैसे शाख का एक पंछी
आस करे नील गगन की
फिर नीड़ से प्रश्न करे वो
संग सोहबत में पवन की
एक परिंदे की तुझसे ये
नातेदारी क्यों है?
तू अगर...

उड़ने वाले जल्दी क्या है
मन कहता है और रुक ले
इन पाँखों का सौदा करके
पिंजरे का ही दाना चुग ले
तू अम्बर का राही है तो
मन व्यापारी क्यों है?
तू अगर...

इस असीम नभ की सीमा
है संशय कि हो ना हो
चल नीड़ के भीतर देखें
कदाचित कोई कोना हो
जहाँ मन से पूछ सके तू
व्यग्रता भारी क्यों है?
तू अगर...

प्रश्न खुद ही ले आयेगा
अपना उत्तर तेरे पास
कुआँ भी आता है चलकर
कभी कभी प्यासे के पास
इसी ठौर पे ठहर मन तू
पथ-पुजारी क्यों है?
तू अगर...

झाँक लिया निज अंतस में
जब अपने ही दृगकोर से
देह नीड़ से बँधा परिंदा
देख लिया मन की डोर से
क्या पूछना अब किसी से
मन मदारी क्यों है?
तू अगर...

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 22, 2017

पद-अर्थ विज्ञान

मैंने सुना है
अत्यधिक दाब में
कोई भी ठोस पदार्थ
बन जाता है द्रव
शायद इसीलिए
पिघल जाता है अक्सर
मजबूत से मजबूत इंसान
और बह पड़ते है कभी कभी
आँखों के रस्ते
पाषाण ह्रदय भी

विज्ञान के इस सिद्धांत को
मानता है शायद
अर्थशास्त्र भी
तभी तो भूख के दाब में
पसीने सी पिघलकर
जब बहती है
एक मज़दूर की देह
तब बढ़ती है समाज में
तरलता
अर्थात लिक्विडिटी

मैंने सुना है
और अधिक दाब में
द्रव भी उड़ जाता है
भाप बनकर
तभी तो
एक अंतराल के बाद
स्वार्थ के नीचे दबे
समाज का
मर जाता है पानी
और सूख जाते हैं
ज़रूरतों के दाब में
गरीब के आँसू

अफसरशाही भी समझती है
विज्ञान के इस नियम को
और दबा लेती है
मुआवजे की फ़ाइल
तब भाप बन उड़ जाती है
क़र्ज़ में दबे किसान की आशा
शहीद की विधवा के सपने
उसके बच्चों का भविष्य
फिर समय के साथ
ओझल हो जाती है शहादत
हमारी दृष्टि और स्मृति पटल से
किसी सरकारी रिकॉर्ड में
सदा के लिये
दफ़न होने

इस वैज्ञानिक सिद्धांत को
खूब समझता है समाज
शायद इसलिये
दबा लेता है संवेदनायें
तब उड़ जाती है
भाप बनकर मानवता
बहुत सूक्ष्म होता है
ये परिवर्तन
नहीं दिखता कोरी आँख से
समाज से होता
इंसानियत का वाष्पीकरण

मैं सोच रहा हूँ
इसी सिद्धांत पर
चलती होगी नियति
जब कूटती है
जीवन की ओखली में
वक़्त की मूसल से
हमारा अहंकार
इतना महीन कि
निकल सके बाहर
छद्म आवरण के बारीक
भ्रम रुपी छिद्रों से
बह जाये तरल रूप में
आँख से
या उड़ जाये किसी दिन
धुआँ बनकर
मन के पात्र से

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 15, 2017

भज गोविन्दम् तज संदेशम्

व्यक्ति को भज लेना किन्तु विचार को कभी मत भजना। अन्यथा जीवन में तिरस्कार और क्षोभ के अतिरिक्त कुछ प्राप्त ना होगा।

संसार में चिरकाल से नेतृत्व दो ही प्रकार के रहे हैं, विचारवादी और लक्ष्यवादी। किन्तु राजनेता एक ही प्रकार के पाये जाते हैं, लक्ष्यवादी। यहाँ इस बात पर बहस नहीं हो रही कि किसका विचार सही और किसका गलत। वो विचारवादियों का आंतरिक मसला है और किसी के अंदरूनी मामले में दखल देना हमारे हिंदुस्तानी संस्कारों में नहीं है। इसी संस्कार के तहत हम पडोसी के घर में लगी आग को उनका अंदरूनी मामला बताकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।

बहरहाल विचारवादी किसी विचार को लेकर संघर्ष करते हैं और लक्ष्यवादी किसी लक्ष्य को लेकर। यानि की विचारवादियों का उद्देश्य यदि विचार की स्थापना होता है तो लक्ष्यवादियों का उद्देश्य होता है लक्ष्य की प्राप्ति। यह लक्ष्य येन केन प्रकारेण स्वयं को स्थापित करने और स्थापित रखने का होता है। विचारवादी परोक्ष रूप से अपने विचार के साथ खड़ा दिखता है और लक्ष्यवादी भी परोक्ष रूप में ही खड़ा दिखता है मगर किसी मुद्दे के साथ। कृपया भ्रमित ना हों, मुद्दे के साथ खड़ा होना और हल के साथ खड़े होने में फर्क है। चूँकि हमारे और आपके जैसे समर्थक किसी विचार के ही हो सकते हैं और सफलता भी समर्थकों पर ही निर्भर करती है, लिहाजा लक्ष्यवादियों को भी अस्थायी रूप से भेड़ की खाल रुपी एक विचार तो ओढ़ना ही पड़ता है। वो विचार सेकुलरिज्म, राष्ट्रवाद, जातिवाद, आपवाद कुछ भी हो सकता है।

यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ की समर्थक किस चिड़िया का नाम होता है। समर्थक वह विश्वासु जीव होता है जो किसी विचार विशेष की स्थापना का स्वप्न देखता है और उसके लिए व्यक्ति विशेष को स्थापित करने में जी जान लगा देता है। व्यक्ति के स्थापित होते ही, विचार को स्थापित मानकर वह स्थापित व्यक्ति के समर्थन में सोशल मीडिया पर सक्रीय हो जाता है। अब जब नेता दो प्रकार के होते हैं तो समर्थक भी दो ही प्रकार के होते हैं, भक्त और अंधभक्त। और जो इन दोनों में से कोई नहीं होता वो जनता होती है। अंधभक्त एक ही प्रकार का होता है। समर्थन के एग्रीमेंट के तहत वो अपने नेतृत्व से प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं माँगता।

किन्तु भक्त दो प्रकार के होते हैं, जागरूक और स्वार्थचुक (नया शब्द है, मैंने भी पहली बार सुना है अपने मुँह से)। जागरूक अर्थात वो जो व्यक्ति के स्थापित होते ही समय समय पर प्रोग्रेस रिपोर्ट माँगते हैं। ये लक्ष्यवादी नेतृत्व के आचरण में उसके ही वक्तव्य को ढूँढने की भूल कर बैठते हैं और प्रथम चरण में ही अलग अलग तरीकों से सिस्टम से बाहर कर दिये जाते हैं। तदुपरांत उन्हें यह बोध होता है कि व्यक्ति की स्थापना और विचार की स्थापना दोनो अलग बातें हैं।

दूसरे प्रकार के भक्त कहलाते हैं स्वार्थचुक, अर्थात वो जिनका स्वार्थ चुकते ही उनकी भक्ति भी चुक जाती है। ये लेखा जोखा (हिस्सा माँगने से पूर्व माँगे जाने वाला आय व्यय का ब्यौरा) माँगने का दुस्साहस करते हैं। ये अलग अलग राजनीतिक दलों में अलग अलग नामों से पाये जाते हैं। ये द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, आदि चरणों में स्टेप बाय स्टेप बाहर किये जाते हैं। कालान्तर में, ये विलंब से जागने वाले स्वार्थचुक समर्थक, उसी गति को प्राप्त करते हैं, जिस गति को साहित्य जगत में एक चौपाये विशेष द्वारा धोबी के समर्थक होने की दशा में प्राप्त किया जाता है।

एक ओर जहाँ अंधभक्तों को सत्ता की नज़दीकी का भ्रम रहता है वहीँ भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान का वृद्धावस्था से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। अतः ज्ञान प्राप्त होते होते भक्तगण राजनैतिक रूप से वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुके होते है। इस बीच स्थापित व्यक्ति के भक्तों की नई फसल ऊग चुकी होती है। अब आप प्रकृति को अपना काम करने से तो नहीं रोक सकते ना।

आप सोच रहे होंगे कि सेठ जी इतने लंबे व्याख्यान के माध्यम से आखिर कहना क्या चाहते हैं? तो मैं आपको बता दूँ कि सेठ जी सोच रहे थे की भगवान ने सतयुग से लेकर कलयुग तक कई अवतार लिए, पैगम्बर भी भेजे और पुत्र भी भेजा। अनेक प्रतिनिधि संत भी सदा से विचरण कर रहे हैं। फिर भी यह संसार पतनोन्मुख क्यों है? शायद इसलिए की वही गलती अवतरित शक्तियों ने भी की। ये सभी व्यक्ति विशेष की स्थापना कर के निकल लिए। अब देखिये ना, लंका में विभीषण, हस्तिनापुर में पांडव, इत्यादि। इसके बाद ना तो कोई फीडबैक रिपोर्ट ली गई ना प्रोग्रेस रिपोर्ट। मैनेजमेंट की इस बड़ी चूक के कारण धर्म स्थापना का सिद्धांत कुछ दिन तक चला हो तो पता नहीं लेकिन आज तो...?? प्रोग्रेस रिपोर्ट लेना वो भूल गए या उन्हें मिली नहीं, इस विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। इतिहास में व्यक्ति के स्थापित होने के बाद का उल्लेख कम ही मिलता है। कदाचित इसलिए की इतिहास रचियता भी वही लोग हैं जो उक्त काल में स्थापित हुये थे।

सार ये है मित्रो, भाइयो और बहनो; यदि आप भी किसी नमो, सर जी या रागा को स्थापित करके प्रोग्रेस रिपोर्ट की उम्मीद लगाये हैं, तो आइये और राजनीतिक बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए, मेरी तरह चुपचाप लाइन में खड़े हो जाइये।

- ठेठ वाणी

Thursday, May 11, 2017

पत्थर के सनम

दुष्यंत कुमार जी ने कहा था...

"कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं होता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो"

लेकिन ज्ञान यदि गलत कानों में पड़ जाये तो दुरूपयोग की सम्भावना बढ़ जाती है और परिणाम वही होता है जैसे पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम। अब देखिये ना, यही शेर एक कश्मीरी पत्थर ने सुन लिया। फिर क्या, वही हुआ जिसका डर था। वह पूरी तबियत से उछलता हुआ आया और एक सुराख कर गया हमारी अखंडता में। सफलता एक ऐसी चीज़ है जो हमेशा दूसरों को प्रेरित करती है। लिहाजा एक पत्थर की सफलता देखकर बहुत से पत्थरों ने उछलना शुरू कर दिया। आज हमारी अखंडता के आसमान में सुराख ही सुराख हैं।

आजादी को बरस हो गए हैं सत्तर
लेकिन बरसना बंद नहीं हुये पत्थर
मैंने अपनी अस्मिता पर उछाले गए
उस पत्थर से पूछा
तू किधर से आया है, तुझे किसने उछाला है?
यूँ ही बड़ा हो गया या किसी ने पाला है?

बोला, मुझे नहीं पता
तुम्हारी उनकी किस बात पे ठनी है
ये परंपरा तो यहाँ बरसों की बनी है
मैं मुफ़्त में बदनाम हूँ बिना बात के
मैं तो इशारे पर चलता हूँ किसी हाथ के
नहीं मालूम ठिकाने पे हैं या खिसके हैं
इन हाथों के पीछे दिमाग किसके हैं

फिर मैंने हौले से एक हाथ को थामा
और पूछ ही लिया खरामा खरामा
बोला, हम तो निरंकुश और आज़ाद हैं
पके हुए फोड़े का बहता हुआ मवाद हैं
इतिहास की गलती से उपजा हुआ विवाद हैं
आप की ख़ामोशी से भड़कता उन्माद हैं

तब मैंने उन्माद से पूछा क्या चाहते हो?
क्यों मासूम नौजवानों को बहकाते हो?
बोला, हम तो जूनून का बहता एक दरिया हैं
मनुष्य की मूढ़ता के प्रदर्शन का जरिया हैं
हमने ऊँगली पकड़ी, सर चढ़ते चले गए
तुमने रोका नहीं तो हम बढ़ते चले गए

मैं सोच रहा हूँ,
ये कायरता है या हमारा मिजाज़ ही नर्म है
यदि खून में बाकी थोड़ी सी भी शर्म है
ईंट का जवाब पत्थर, पत्थर का पहाड़ से
सिंहपुत्र का परिचय तो होता है दहाड़ से
अहिंसा का त्याग करो, यही वीर का कर्म है
उन हाथों को काट दो, अब यही राष्ट्रधर्म है

हे सत्ताधारी हे राष्ट्र ऋषि
तुम मूक होकर क्यों देख रहे हो
सैनिक की कीमत पर सियासती
रोटियाँ क्यों सेक रहे हो
तुम रोक नहीं रहे पत्थर तो यकीन मानो
वो तुम ही हो जो फेक रहे हो

© - प्रशांत सेठ