मैं देखता हूँ जब भी
ऊँचे खड़े, हरे भरे
आसमान छूते वृक्ष को
मैं नाप लेता हूँ
उसकी जड़ों की गहराई
मैं जानता हूँ
परिवार रुपी वृक्ष का एक अंश
जब सहर्ष स्वीकार लेता है
नीचे की ओर बढ़ना
तब चूम पाती हैं अन्य टहनियाँ
सफलता का आकाश
इस वृक्ष पर जब देखता हूँ
खिलते पुष्प और पल्लव
लहलहाते रसीले फल
मैं ढूँढता हूँ
मिट्टी में गहरे दबे
उस बीज को
जिसने स्वीकार किया था
प्रेम में स्वयं टूट कर
औरों को जीवन देना
मैं देखता हूँ
उस बीज का अस्तित्व
फलते फूलते वृक्ष के
रोम रोम में
मैं जानता हूँ
प्रतिभा और सफलता के बीच
होती है एक महीन सी रेखा
दायित्व की
इस रेखा के उस पार
होता है एक अवसर
सबको छोड़कर
स्वयं आगे बढ़ जाने का
नहीं लाँघ पाते, बड़े लोग
ये छोटी सी रेखा
और रह जाते हैं गाँव में
घर के प्राचीन अवशेष
और माँ बाबूजी की
विरासत को सम्हालने
गाँव के टूटे घर में दफ़न
इन्हीं छोटे छोटे बीजों से
उगते हैं
तुम्हारे शहर के बड़े बड़े मकान
फिर से देखो
इस बार मेरी दृष्टि से
तुम्हारी जमीन के नीचे मिलेंगी
कुछ गुमनाम जड़ें
जिन्होंने
धरती का सीना फाड़कर
तुम्हें पहुँचाया आकाश तक
एक बेनाम बीज
जिसकी छाती भेदकर
तुमने पाया है जन्म
तुम्हारे पैरों के नीचे मिलेंगे
वो मजबूत काँधे
जिन्होंने उठा रखा था
तुम्हारे हिस्से का दायित्व
संघर्ष के दिनों में
तुम्हारे काँधों पर नहीं था
कोई बोझ
सिवाय खुद के
अब
जब तुम चमकते हो
सफलता के आकाश में
प्रसिद्धि के सूर्य समान
और सुनाते हो अपनी
सफलता के किस्से
तब
मैं तुमसे करना चाहता हूँ
एक सौदा
तुम अपनी जड़ों को कभी
असफल मत कहना
मैं भी तुम्हें
खुदगर्ज़ नहीं कहूँगा
© - प्रशांत सेठ
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