मैं देखता हूँ
अहंकार के अश्व पर सवार
श्रेष्ठता की दौड़ में संलग्न
बहुत सी भेड़ों को
इन भेड़ों की मैं मैं से
जन्मता एक जादूगर
जो दिखाता है
एक गुमनाम चिट्ठी
चिट्ठी किसी अनाम ईश्वर की
जो आयी है
सिर्फ और सिर्फ उसके पते पर
चिट्ठी जिसमें है पैगाम
दुनिया भर की भेड़ों के लिये
के तुम्हें करना है शासन
दूसरी भेड़ों पर
और फिर एक दिन यही भेड़ें
खो देती हैं अपनी पहचान
और बन जाती हैं
भेड़िया
मैं फिर देखता हूँ
इन्द्रियों के अश्व से सुसज्जित
देह के रथ पर सवार
कुछ और भेड़ें
इच्छाओं के बियाबान जंगल में
भटककर
जब तलाशती हैं रास्ता
तब धीरे से कोई बाबा
पकड़ा देता है
चमत्कार का झुनझुना
भेड़ें चल देती हैं उसके पीछे
और फिर जन्मता है
एक ऐसा ईश्वर
जो साध्य नहीं होता
बल्कि होता है साधन
इच्छाओं की पूर्ति का
और भेड़ें,
फिर भटक जाती हैं
मैं जानता हूँ
जहाँ भीड़ है वहाँ
खो जाती है
मंजिल खुद ही
मैं लौट पड़ता हूँ
इन रास्तों से उलट
एक ऐसी राह पर
जहाँ मिलते हैं
कुछ एकाकी राही
वो नहीं पकड़ाते कोई झुनझुना
नहीं दिखाते कोई चिट्ठी
मगर
बता देते हैं इशारों से
आगे की राह
मैं चल पड़ता हूँ निश्चिन्त
इस अनजान मगर
सुनिश्चित राह पर
अब मैं किसी को
हराना नहीं चाहता
चाहता हूँ जीत लेना
बस खुदको
मैं जान गया हूँ
एक बूँद ज्यों नकार बैठे
समंदर का अस्तित्व
ऐसे ही भूल गयी थी
ये मन की भेड़
अपने ही उस
अनंत विस्तार को
जिसका नाम...?
कुछ भी हो
अब फर्क नहीं पड़ता
© - प्रशांत सेठ
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