Saturday, September 30, 2017

संस्कार माला - II

बेटी सिद्धि सेठ के जन्मदिन पर अनेक शुभकामनाओं और आशीष सहित पिता का प्रेमपूर्ण उपहार।

जीवन में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों और मनःस्थितियों में, पौराणिक चरित्रों से प्रेरणा लेने की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुये, संस्कारों की माला का द्वितीय भाग।

जब
घोर तप अर्जित विद्या से हो शक्ति सबल
और ह्रदय में हो तुम्हारे श्रद्धा भक्ति अटल
जीवन स्वयं ले आये तभी विष का प्याला
माँग ले अंगुष्ठ ही जब हाथ थामने वाला
तब समझ लेना
बनके याचक यदि स्वयं श्रद्धेय खड़ा है
हे एकलव्य,
नियति का हेतु निज सर्वस्व से बड़ा है
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जब
तिरस्कृत सा पाओ स्वयं को संसार में
एकाकी जीवन हो बियाबान उजाड़ में
चख लिये हों स्वाद तुमने जीवन के सारे
खट्टे, मीठे, तीखे, कड़वे और खारे
तब समझ लेना
निज ह्रदय में राम का होगा निवास
हे शबरी,
मन कुटी में शेष रहे केवल मिठास
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जब
आस पास अज्ञानमय अँधेरा घना हो
असत्य के शोर में सत्य कहना मना हो
पा जाओ ऐसे में कभी ज्ञान का वो धन
करा सको दृष्टिहीनों को सत्य का दर्शन
तब समझ लेना
अंधत्व की संतान को मिली दृष्टि है
हे श्रवण,
कोई आशा रखती तुमसे स्वयं सृष्टि है
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जब
मिल जाये कभी राजपाट तुम्हें भाग्य से
मन विह्वल रहे किन्तु भीतर वैराग्य से
बहते हों नयन तुम्हारे पर-पीड़ा के कारण
वाणी करती हो औरों के दुःख का निवारण
तब समझ लेना
ह्रदय करुणा से जिसका भी शुद्ध हुआ है
हे सिद्धार्थ,
उसी के भीतर उदय कोई बुद्ध हुआ है
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जब
स्वार्थ की मंथरा बुद्धि पर दुष्प्रभाव करे
ह्रदय से गमन तुम्हारे निर्मल भाव करे
विवेक और मर्यादा को देकर निष्कासन
परिस्थिति सजाये तुम्हारे लिये सिंहासन
तब समझ लेना
बुद्धि रहे अधीन, जीवन भाव प्रधान रखना
हे भरत,
ह्रदय अयोध्या का राजा सदैव राम रखना
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जब
अस्तित्व पर घोर संकट की घड़ी हो
दरिद्रता समक्ष तुम्हारे द्वार खड़ी हो
मन विहल, भविष्य की चिंता लगे सताने
झोली में शेष हों तुम्हारी मुट्ठी भर दाने
तब समझ लेना
जो कुछ है पास वो भी कर देना अर्पण
हे सुदामा,
पाया है उसीने जिसने किया समर्पण
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जब
रिसती पीड़ा हो ह्रदय के घाव से
उपजती कटुता हो मन के भाव से
धधकती हो ज्वाला भीतर क्रोध की
बलवती हो इच्छा जब प्रतिशोध की
तब समझ लेना
ज्ञान शक्ति विफल, लक्ष्य दुश्वार है
हे अश्वत्थामा,
"मैं" के अश्व पर तुम्हारा मन सवार है
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जब
निज कौशल पर होने लगे तुम्हें अभिमान
अधर्म की सभा में पाने लगो तुम सम्मान
अहंकार होता हो बलवान पाकर कुसंग
चन्दन से आकर लिपटते हों भुजंग
तब समझ लेना
अधर्म पराजित है सदा धर्म के प्रहार से
हे कर्ण,
बँध मत जाना किसी अधर्मी के उपकार से
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© - प्रशांत सेठ

(प्रथम भाग संस्कार माला http://prasantseth.blogspot.com/2017/01/blog-post_11.html)

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