एक वस्तु
वस्तु पर पड़ती
श्वेत प्रकाश की किरणें
उन किरणों में छुपे
इंद्रधनुष के सात रंग
कुछ रंग हो जाते हैं अवशोषित (absorb)
कुछ परावर्तित (reflect)
वस्तु देती है आभास
उसी परावर्तित रंग में रंगे होने का
जो लौट कर आता है
तुम्हारी आँखों तक
कुछ ऐसा ही पढ़ा था
भौतिकी में
प्रकाश का विज्ञान
जो रंग कभी था ही नहीं
दृश्य का
वही समाहित हुआ आकर
तुम्हारी दृष्टि में
मन
मन में भाव
भावों के अनेक रंग
मन का प्रकाश जब पड़ता है
समाज पर
लौटा देता है समाज भी
घृणा, वैमनस्यता अथवा प्रेम के
वही रंग
जो रहते हैं समाहित
तुम्हारी दृष्टि में
इन्हीं रंगों में ढूँढ़ते हो तुम
जब अपने इष्ट को
दिखायी पड़ता है वो भी
मन के रंग में रंगा हुआ
कदाचित इसीलिये
जो दिख रहा है वो
सत्य नहीं है
हरा भी, तुम्हारी दृष्टी
भगवा भी, तुम्हारा ही मन
तुमने ये भी पढ़ा होगा
जो वस्तु कर लेती है समाहित
सारे रंग
प्रतीत होती है उसमें
कालिमा
जैसे अथाह अंतरिक्ष
और जिसपर नहीं ठहरता
कोई रंग
वो दिखती है श्वेत
जैसे कोरा कागज
मन का हर भाव
जब ठहर जाता है इष्ट पर
वो समेट लेता है खुद में
तुम्हारी कालिमा
और शेष रह जाती है इधर
केवल उज्ज्वलता
प्रकाश से भिन्न नहीं होता
भक्ति का विज्ञान
इसी में छुपा है शायद
उस सनातन प्रश्न का उत्तर
राधा क्यों गोरी,
वो क्यों काला??
© - प्रशांत सेठ
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