Saturday, March 3, 2018

एक रंग प्रेम का

प्रकृति यानि विविधता, विविधता यानि अनेक रंग, कुछ पसंद कुछ नापसंद। होली इन सारे रंगों को स्वीकार करने का दिन है। इस विराट सृष्टि में सिर्फ "मैं" और "तू" का रंग नहीं है, और भी बहुत से रंग हैं। ये "मैं" और "तू" मिल जायें तो "हम" बनता है, ना मिलें तो "तू तू मैं मैं"।

"मैं" और "तू" में लिप्त जीवन
उत्सव का नहीं ये ढंग है
"हम" होकर ही तुम जानोगे
सृष्टि रचती कितने रंग है

अपनी अपनी दृष्टि का सत्य
मुझको प्यारा तुमको प्यारा
अहम् की इस एक लकीर ने
रिश्तों में किया बँटवारा
क्यों ह्रदय द्वार पर बैठे
द्वेष घृणा के ये भुजंग हैं
"हम" होकर ही ....

घर परिवार या कुटुम्बी बस
इतना ही तुम समझे अपना
अपनेपन की सीमा विस्तृत
करने की तैयारी रखना
फागुन तुमसे फिर पूछेगा
बैर बड़ा या क्षमा दबंग है
"हम" होकर ही ....

माटी का घट बन के माटी
इक दिन कण कण जा बिखरेगा
देह चढ़ा रंग भी उस दिन
उतरना है सो उतरेगा
मन पर अमिट रंग चढ़ा कर
उड़ने दो के मन पतंग है
"हम" होकर ही ....

खुद में सारे रंग समेटे
श्याम रंग रंगा घनश्याम
जिसके सारे रंग समर्पित
वो गोरी राधा निष्काम
रंग प्रेम का इनसे पाया
जिसने भी वही मलंग है
"हम" होकर ही ....

© - प्रशांत सेठ