Friday, August 4, 2017

कुटुम्ब

मैं देखता हूँ जब भी
ऊँचे खड़े, हरे भरे
आसमान छूते वृक्ष को
मैं नाप लेता हूँ
उसकी जड़ों की गहराई
मैं जानता हूँ
परिवार रुपी वृक्ष का एक अंश
जब सहर्ष स्वीकार लेता है
नीचे की ओर बढ़ना
तब चूम पाती हैं अन्य टहनियाँ
सफलता का आकाश

इस वृक्ष पर जब देखता हूँ
खिलते पुष्प और पल्लव
लहलहाते रसीले फल
मैं ढूँढता हूँ
मिट्टी में गहरे दबे
उस बीज को
जिसने स्वीकार किया था
प्रेम में स्वयं टूट कर
औरों को जीवन देना
मैं देखता हूँ
उस बीज का अस्तित्व
फलते फूलते वृक्ष के
रोम रोम में

मैं जानता हूँ
प्रतिभा और सफलता के बीच
होती है एक महीन सी रेखा
दायित्व की
इस रेखा के उस पार
होता है एक अवसर
सबको छोड़कर
स्वयं आगे बढ़ जाने का
नहीं लाँघ पाते, बड़े लोग
ये छोटी सी रेखा
और रह जाते हैं गाँव में
घर के प्राचीन अवशेष
और माँ बाबूजी की
विरासत को सम्हालने
गाँव के टूटे घर में दफ़न
इन्हीं छोटे छोटे बीजों से
उगते हैं
तुम्हारे शहर के बड़े बड़े मकान

फिर से देखो
इस बार मेरी दृष्टि से
तुम्हारी जमीन के नीचे मिलेंगी
कुछ गुमनाम जड़ें
जिन्होंने
धरती का सीना फाड़कर
तुम्हें पहुँचाया आकाश तक
एक बेनाम बीज
जिसकी छाती भेदकर
तुमने पाया है जन्म
तुम्हारे पैरों के नीचे मिलेंगे
वो मजबूत काँधे
जिन्होंने उठा रखा था
तुम्हारे हिस्से का दायित्व

संघर्ष के दिनों में
तुम्हारे काँधों पर नहीं था
कोई बोझ
सिवाय खुद के
अब
जब तुम चमकते हो
सफलता के आकाश में
प्रसिद्धि के सूर्य समान
और सुनाते हो अपनी
सफलता के किस्से
तब
मैं तुमसे करना चाहता हूँ
एक सौदा
तुम अपनी जड़ों को कभी
असफल मत कहना
मैं भी तुम्हें
खुदगर्ज़ नहीं कहूँगा

© - प्रशांत सेठ

Thursday, August 3, 2017

मातृ स्वरुप दादा भैया मामा को विनम्र श्रद्धांजलि

जब जब ह्रदय मथा है मैंने
तब तब अधर लगे कुछ कहने
जब जब अधर सिये हैं मैंने
तब तब नयन लगे हैं बहने
मत अधरों को रोको
मत नयनों को बहने दो
आँसू हैं श्रृंगार ह्रदय का
ह्रदय में रहने दो

- श्री प्रभात नीखरा

प्रिय मामाजी श्री प्रभात नीखरा जी "दादा भैया" की उपरोक्त पंक्तियाँ उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय देती हैं। संघर्ष और टूटन से सृजन करना प्रकृति की विशेषता होती है। जब एक बीज कहीं गहरे मिटटी में दब कर टूटता है, तब उसमें सम्पूर्ण मानवता को पोषित करने की क्षमता निखर कर बाहर आती है। ऐसा भी कह सकते हैं कि अपनी टूटन को सृजन में परिवर्तित कर देने का गुण जिसमें होता है, प्रकृति ऐसे व्यक्तित्व को ही सृजन का दायित्व सौंपती है।

मैं समझ सकता हूँ प्रकृति ने दादा भैया को परिवार की नींव बनने के लिये क्यों चुना। संघर्ष उसी के हिस्से में आता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं और जो आगे बढ़ कर स्वयं दायित्व उठाता है। भाई का पद तो जन्म से प्राप्त हो जाता है परंतु घर का दादा भैया होने के लिये कर्तव्यनिष्ठा के साथ साथ त्याग, धैर्य और प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय की आवश्यकता होती है। कदाचित इसलिये मामाजी अपने घर के बड़े भाई ही नहीं, "दादा भैया" थे। उनके दिये हुये संस्कार और चिंतन के बीज ने आज एक दो नहीं, सैंकड़ों वृक्ष को इतनी गहरायी दी है कि वो सभी अपने अपने स्थान पर खड़े होकर आकाश को चुनौती दे रहे हैं। कल उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हज़ारों लोगों की आँखों में अश्रुधारा इस बात का द्योतक थी के दादा भैया की स्मृतियाँ हम सभी के ह्रदय में सदा पुष्पित और पल्लवित होती रहेंगे।

यदि मामा शकुनि हो तो भांजे का दुर्योधन होना निश्चित है। यदि मामा कंस हो तो भांजा कृष्ण ही होगा। परंतु यदि मामा स्वयं कृष्ण हो तब?
तब अभिमन्यु का जन्म होता है। मेरे जीवन की प्रेरणा, व्यक्तित्व के निर्माता और कवि मन को जागृत करने वाले प्रिय मामाजी को मेरी श्रद्धापूर्ण भावांजलि।

- प्रशांत सेठ