हवा में उड़ता हुआ
एक पत्थर आया
मेरी कॉर्पोरेट सरकार के
शीशे से टकराया
फिर धूल झाड़कर उठा
हौले से मुस्कुराया
पूछा तो परिचय उसने
कुछ यूँ बताया
खेत से उठता एक
सियासी तूफान हूँ
भाईसाहब, मैं कर्ज में दबा हुआ
देश का किसान हूँ
बोला, आप जानते हैं
किसान क्या होता है?
वही जो धरती के सीने पर
श्रम का हल होता है
आज की भूख दबाकर
कल की रोटी बोता है
फिर पसीने से उसे सींचकर
अच्छे दिन की बाट जोहता है
उम्मीद की टूटी खाट पर
जागता ना सोता है
और फसल आने पर पहले से
ज़्यादा गरीब होता है
हम कलमकारों की नीयत
हमेशा साफ़ होती है
हमारी मासूमियत भरी जिज्ञासा
हरदम माफ़ होती है
बुद्धिजीवियों के सवाल
बड़े पवित्र रहते हैं
इस बात को कोई और नहीं
स्वयं बुद्धिजीवी कहते हैं
मैंने डरते डरते पूछा
क्या आप और वो आपस में
रिश्तेदार सगे हैं?
जो पत्थर कश्मीर से आकर
दिल्ली को लगे हैं?
बोला, वो भी एक प्रकार के
परिश्रमी किसान हैं
फर्क इतना है कि उनके
भरे हुये खलिहान हैं
जिन्होंने देश की छाती पर
बँटवारे का हल चलाया है
जनमानस के ह्रदय में
नफरत का बीज लगाया है
सींचने के नाम पर
मासूमों का खून बहाया है
आज उनके परिश्रम से देखो
आतंकवाद लहलहाया है
सियासत ही हम दोनों को
जन्म देती आयी है
आपने ठीक पहचाना
वो मेरा सगा भाई है
आज उसी की प्रेरणा से
हम देश को जला रहे हैं
भोपाल से दिल्ली तक
किसी का रास्ता बना रहे हैं
अभी तो बहुत से मगरमच्छ
अश्कों की गंगा में बहायेंगे
हमारे काँधों पर चढ़कर
राजधानी तक जायेंगे
और हम जहाँ खड़े हैं वहीँ
खड़े खड़े मर जायेंगे
शास्त्रीजी ने हम को
जय किसान कहा था
तब किसान का ये अर्थ
किसी को पता कहाँ था?
हिंसक औलाद जनने से
एक माँ भी डरती है
शायद इसलिये आज बाँझ
हो चली ये धरती है
अपनी भूमि छोड़कर
पलायन को मजबूर है
गाँव का किसान आज
शहर में मज़दूर है
मैं सोच रहा हूँ,
हर उफान के पीछे
एक पीड़ा होती है
और हर पीड़ा पर इस देश में
राजनीतिक क्रीड़ा होती है
क्योंकि सियासत की दुनिया में
ये सिद्धांत खूब चलता है
फिर नहीं ऊगता वो सूरज
जो एक बार ढलता है
वो दिल्ली के मेले में गुम
होने से डरती है
सियासत तभी तो उन्माद का
हाथ थामकर चलती है
© - प्रशांत सेठ
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