Friday, June 2, 2017

त्रिशंकु

राख में दबी दबी सी
इक चिंगारी क्यों है?
तू अगर वैरागी है तो
मन संसारी क्यों है?

जैसे शाख का एक पंछी
आस करे नील गगन की
फिर नीड़ से प्रश्न करे वो
संग सोहबत में पवन की
एक परिंदे की तुझसे ये
नातेदारी क्यों है?
तू अगर...

उड़ने वाले जल्दी क्या है
मन कहता है और रुक ले
इन पाँखों का सौदा करके
पिंजरे का ही दाना चुग ले
तू अम्बर का राही है तो
मन व्यापारी क्यों है?
तू अगर...

इस असीम नभ की सीमा
है संशय कि हो ना हो
चल नीड़ के भीतर देखें
कदाचित कोई कोना हो
जहाँ मन से पूछ सके तू
व्यग्रता भारी क्यों है?
तू अगर...

प्रश्न खुद ही ले आयेगा
अपना उत्तर तेरे पास
कुआँ भी आता है चलकर
कभी कभी प्यासे के पास
इसी ठौर पे ठहर मन तू
पथ-पुजारी क्यों है?
तू अगर...

झाँक लिया निज अंतस में
जब अपने ही दृगकोर से
देह नीड़ से बँधा परिंदा
देख लिया मन की डोर से
क्या पूछना अब किसी से
मन मदारी क्यों है?
तू अगर...

© - प्रशांत सेठ

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