मैंने सुना है
अत्यधिक दाब में
कोई भी ठोस पदार्थ
बन जाता है द्रव
शायद इसीलिए
पिघल जाता है अक्सर
मजबूत से मजबूत इंसान
और बह पड़ते है कभी कभी
आँखों के रस्ते
पाषाण ह्रदय भी
विज्ञान के इस सिद्धांत को
मानता है शायद
अर्थशास्त्र भी
तभी तो भूख के दाब में
पसीने सी पिघलकर
जब बहती है
एक मज़दूर की देह
तब बढ़ती है समाज में
तरलता
अर्थात लिक्विडिटी
मैंने सुना है
और अधिक दाब में
द्रव भी उड़ जाता है
भाप बनकर
तभी तो
एक अंतराल के बाद
स्वार्थ के नीचे दबे
समाज का
मर जाता है पानी
और सूख जाते हैं
ज़रूरतों के दाब में
गरीब के आँसू
अफसरशाही भी समझती है
विज्ञान के इस नियम को
और दबा लेती है
मुआवजे की फ़ाइल
तब भाप बन उड़ जाती है
क़र्ज़ में दबे किसान की आशा
शहीद की विधवा के सपने
उसके बच्चों का भविष्य
फिर समय के साथ
ओझल हो जाती है शहादत
हमारी दृष्टि और स्मृति पटल से
किसी सरकारी रिकॉर्ड में
सदा के लिये
दफ़न होने
इस वैज्ञानिक सिद्धांत को
खूब समझता है समाज
शायद इसलिये
दबा लेता है संवेदनायें
तब उड़ जाती है
भाप बनकर मानवता
बहुत सूक्ष्म होता है
ये परिवर्तन
नहीं दिखता कोरी आँख से
समाज से होता
इंसानियत का वाष्पीकरण
मैं सोच रहा हूँ
इसी सिद्धांत पर
चलती होगी नियति
जब कूटती है
जीवन की ओखली में
वक़्त की मूसल से
हमारा अहंकार
इतना महीन कि
निकल सके बाहर
छद्म आवरण के बारीक
भ्रम रुपी छिद्रों से
बह जाये तरल रूप में
आँख से
या उड़ जाये किसी दिन
धुआँ बनकर
मन के पात्र से
© - प्रशांत सेठ
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