Monday, May 15, 2017

भज गोविन्दम् तज संदेशम्

व्यक्ति को भज लेना किन्तु विचार को कभी मत भजना। अन्यथा जीवन में तिरस्कार और क्षोभ के अतिरिक्त कुछ प्राप्त ना होगा।

संसार में चिरकाल से नेतृत्व दो ही प्रकार के रहे हैं, विचारवादी और लक्ष्यवादी। किन्तु राजनेता एक ही प्रकार के पाये जाते हैं, लक्ष्यवादी। यहाँ इस बात पर बहस नहीं हो रही कि किसका विचार सही और किसका गलत। वो विचारवादियों का आंतरिक मसला है और किसी के अंदरूनी मामले में दखल देना हमारे हिंदुस्तानी संस्कारों में नहीं है। इसी संस्कार के तहत हम पडोसी के घर में लगी आग को उनका अंदरूनी मामला बताकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।

बहरहाल विचारवादी किसी विचार को लेकर संघर्ष करते हैं और लक्ष्यवादी किसी लक्ष्य को लेकर। यानि की विचारवादियों का उद्देश्य यदि विचार की स्थापना होता है तो लक्ष्यवादियों का उद्देश्य होता है लक्ष्य की प्राप्ति। यह लक्ष्य येन केन प्रकारेण स्वयं को स्थापित करने और स्थापित रखने का होता है। विचारवादी परोक्ष रूप से अपने विचार के साथ खड़ा दिखता है और लक्ष्यवादी भी परोक्ष रूप में ही खड़ा दिखता है मगर किसी मुद्दे के साथ। कृपया भ्रमित ना हों, मुद्दे के साथ खड़ा होना और हल के साथ खड़े होने में फर्क है। चूँकि हमारे और आपके जैसे समर्थक किसी विचार के ही हो सकते हैं और सफलता भी समर्थकों पर ही निर्भर करती है, लिहाजा लक्ष्यवादियों को भी अस्थायी रूप से भेड़ की खाल रुपी एक विचार तो ओढ़ना ही पड़ता है। वो विचार सेकुलरिज्म, राष्ट्रवाद, जातिवाद, आपवाद कुछ भी हो सकता है।

यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ की समर्थक किस चिड़िया का नाम होता है। समर्थक वह विश्वासु जीव होता है जो किसी विचार विशेष की स्थापना का स्वप्न देखता है और उसके लिए व्यक्ति विशेष को स्थापित करने में जी जान लगा देता है। व्यक्ति के स्थापित होते ही, विचार को स्थापित मानकर वह स्थापित व्यक्ति के समर्थन में सोशल मीडिया पर सक्रीय हो जाता है। अब जब नेता दो प्रकार के होते हैं तो समर्थक भी दो ही प्रकार के होते हैं, भक्त और अंधभक्त। और जो इन दोनों में से कोई नहीं होता वो जनता होती है। अंधभक्त एक ही प्रकार का होता है। समर्थन के एग्रीमेंट के तहत वो अपने नेतृत्व से प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं माँगता।

किन्तु भक्त दो प्रकार के होते हैं, जागरूक और स्वार्थचुक (नया शब्द है, मैंने भी पहली बार सुना है अपने मुँह से)। जागरूक अर्थात वो जो व्यक्ति के स्थापित होते ही समय समय पर प्रोग्रेस रिपोर्ट माँगते हैं। ये लक्ष्यवादी नेतृत्व के आचरण में उसके ही वक्तव्य को ढूँढने की भूल कर बैठते हैं और प्रथम चरण में ही अलग अलग तरीकों से सिस्टम से बाहर कर दिये जाते हैं। तदुपरांत उन्हें यह बोध होता है कि व्यक्ति की स्थापना और विचार की स्थापना दोनो अलग बातें हैं।

दूसरे प्रकार के भक्त कहलाते हैं स्वार्थचुक, अर्थात वो जिनका स्वार्थ चुकते ही उनकी भक्ति भी चुक जाती है। ये लेखा जोखा (हिस्सा माँगने से पूर्व माँगे जाने वाला आय व्यय का ब्यौरा) माँगने का दुस्साहस करते हैं। ये अलग अलग राजनीतिक दलों में अलग अलग नामों से पाये जाते हैं। ये द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, आदि चरणों में स्टेप बाय स्टेप बाहर किये जाते हैं। कालान्तर में, ये विलंब से जागने वाले स्वार्थचुक समर्थक, उसी गति को प्राप्त करते हैं, जिस गति को साहित्य जगत में एक चौपाये विशेष द्वारा धोबी के समर्थक होने की दशा में प्राप्त किया जाता है।

एक ओर जहाँ अंधभक्तों को सत्ता की नज़दीकी का भ्रम रहता है वहीँ भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान का वृद्धावस्था से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। अतः ज्ञान प्राप्त होते होते भक्तगण राजनैतिक रूप से वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुके होते है। इस बीच स्थापित व्यक्ति के भक्तों की नई फसल ऊग चुकी होती है। अब आप प्रकृति को अपना काम करने से तो नहीं रोक सकते ना।

आप सोच रहे होंगे कि सेठ जी इतने लंबे व्याख्यान के माध्यम से आखिर कहना क्या चाहते हैं? तो मैं आपको बता दूँ कि सेठ जी सोच रहे थे की भगवान ने सतयुग से लेकर कलयुग तक कई अवतार लिए, पैगम्बर भी भेजे और पुत्र भी भेजा। अनेक प्रतिनिधि संत भी सदा से विचरण कर रहे हैं। फिर भी यह संसार पतनोन्मुख क्यों है? शायद इसलिए की वही गलती अवतरित शक्तियों ने भी की। ये सभी व्यक्ति विशेष की स्थापना कर के निकल लिए। अब देखिये ना, लंका में विभीषण, हस्तिनापुर में पांडव, इत्यादि। इसके बाद ना तो कोई फीडबैक रिपोर्ट ली गई ना प्रोग्रेस रिपोर्ट। मैनेजमेंट की इस बड़ी चूक के कारण धर्म स्थापना का सिद्धांत कुछ दिन तक चला हो तो पता नहीं लेकिन आज तो...?? प्रोग्रेस रिपोर्ट लेना वो भूल गए या उन्हें मिली नहीं, इस विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। इतिहास में व्यक्ति के स्थापित होने के बाद का उल्लेख कम ही मिलता है। कदाचित इसलिए की इतिहास रचियता भी वही लोग हैं जो उक्त काल में स्थापित हुये थे।

सार ये है मित्रो, भाइयो और बहनो; यदि आप भी किसी नमो, सर जी या रागा को स्थापित करके प्रोग्रेस रिपोर्ट की उम्मीद लगाये हैं, तो आइये और राजनीतिक बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए, मेरी तरह चुपचाप लाइन में खड़े हो जाइये।

- ठेठ वाणी

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