दुष्यंत कुमार जी ने कहा था...
"कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं होता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो"
लेकिन ज्ञान यदि गलत कानों में पड़ जाये तो दुरूपयोग की सम्भावना बढ़ जाती है और परिणाम वही होता है जैसे पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम। अब देखिये ना, यही शेर एक कश्मीरी पत्थर ने सुन लिया। फिर क्या, वही हुआ जिसका डर था। वह पूरी तबियत से उछलता हुआ आया और एक सुराख कर गया हमारी अखंडता में। सफलता एक ऐसी चीज़ है जो हमेशा दूसरों को प्रेरित करती है। लिहाजा एक पत्थर की सफलता देखकर बहुत से पत्थरों ने उछलना शुरू कर दिया। आज हमारी अखंडता के आसमान में सुराख ही सुराख हैं।
आजादी को बरस हो गए हैं सत्तर
लेकिन बरसना बंद नहीं हुये पत्थर
मैंने अपनी अस्मिता पर उछाले गए
उस पत्थर से पूछा
तू किधर से आया है, तुझे किसने उछाला है?
यूँ ही बड़ा हो गया या किसी ने पाला है?
बोला, मुझे नहीं पता
तुम्हारी उनकी किस बात पे ठनी है
ये परंपरा तो यहाँ बरसों की बनी है
मैं मुफ़्त में बदनाम हूँ बिना बात के
मैं तो इशारे पर चलता हूँ किसी हाथ के
नहीं मालूम ठिकाने पे हैं या खिसके हैं
इन हाथों के पीछे दिमाग किसके हैं
फिर मैंने हौले से एक हाथ को थामा
और पूछ ही लिया खरामा खरामा
बोला, हम तो निरंकुश और आज़ाद हैं
पके हुए फोड़े का बहता हुआ मवाद हैं
इतिहास की गलती से उपजा हुआ विवाद हैं
आप की ख़ामोशी से भड़कता उन्माद हैं
तब मैंने उन्माद से पूछा क्या चाहते हो?
क्यों मासूम नौजवानों को बहकाते हो?
बोला, हम तो जूनून का बहता एक दरिया हैं
मनुष्य की मूढ़ता के प्रदर्शन का जरिया हैं
हमने ऊँगली पकड़ी, सर चढ़ते चले गए
तुमने रोका नहीं तो हम बढ़ते चले गए
मैं सोच रहा हूँ,
ये कायरता है या हमारा मिजाज़ ही नर्म है
यदि खून में बाकी थोड़ी सी भी शर्म है
ईंट का जवाब पत्थर, पत्थर का पहाड़ से
सिंहपुत्र का परिचय तो होता है दहाड़ से
अहिंसा का त्याग करो, यही वीर का कर्म है
उन हाथों को काट दो, अब यही राष्ट्रधर्म है
हे सत्ताधारी हे राष्ट्र ऋषि
तुम मूक होकर क्यों देख रहे हो
सैनिक की कीमत पर सियासती
रोटियाँ क्यों सेक रहे हो
तुम रोक नहीं रहे पत्थर तो यकीन मानो
वो तुम ही हो जो फेक रहे हो
© - प्रशांत सेठ
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