भाईसाहब! ये दलित क्या होता है?
जिज्ञासु मन ने हमेशा की तरह
अपना प्रश्न दागा
मैं उठकर वहाँ से भागा
लेकिन क़ानून की तरह हाथ बढ़ाकर
उसने मुझे पकड़ लिया
आज फिर इस व्यंगकार को
सनातन प्रश्न ने जकड़ लिया
मैं समझ गया, अब ये पूछेगा
ये कौन सा जातिगत गणित है?
एक संपन्न राज्यप्रमुख क्यों
आज भी दलित है?
फिर पूछेगा सवर्ण की पत्नी क्यों
दलित की तरह प्रचलित है?
इस दलित मंत्र से सत्ता
कैसे होती फलित है?
मैंने कहा सुनो,
तर्क सिद्धांत में नहीं मिलेगा
तुम्हारे प्रश्न का निराकरण
दलित अवस्था नहीं, जाति है
राजनीति का अलग है व्याकरण
दलित यानि
युगों तक शोषण का पर्याय
त्रेता से कलयुग तक जिसका
नहीं मिल सका उपाय
शबरी के जूठे बेर
कोई राम कितने भी खा ले
केवट के पवित्र भाव में
चरण नहीं, समस्त देह डुबा ले
लोकतंत्र के मस्तक पर ये निशान
पुरानी चोट का है
और बना रहेगा युगों तक क्योंकि
मामला वोट का है
दलित अर्थात
एकलव्य का अंगुष्ठ अर्पण
वर्ण के समक्ष
प्रतिभा का आत्मसमर्पण
द्वापर में एक युवराज ने
शोषण का प्रतिकार किया था
सूतपुत्र कर्ण को जब
अंगराज स्वीकार किया था
तभी से आरक्षण का
यह सिद्धांत चलन में है
राष्ट्रप्रमुख की प्रतिभा नहीं
योग्यता उसके दलन में है
दलित यानि
अपने आप में एक उपलब्धि
वैसे भी यहाँ
प्रतिभा की कीमत कब थी
इस शब्द में छुपा है
उनके पुरखों का संघर्ष
और पीढ़ियों की बढ़ती सम्पन्नता
वर्ष दर वर्ष
पुरखों के शोषण का लाभ
अब तक ले रहे बच्चे हैं
लगे रहने दो स्वाभिमान पर
ये दाग तो अच्छे हैं
© - प्रशांत सेठ
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