जब बेटे ही छाती पे मूंग दलने लगे
लो ज़मीं के तेवर भी अब बदलने लगे
माँ अपने घर में जबसे हुई बेगानी है
नींव छत दरो दीवार सब हिलने लगे
नींव छत दरो दीवार सब हिलने लगे
जननी का तिरस्कार मनुष्य के पतन की पहली निशानी है और धरणी (धरती) का तिरस्कार संपूर्ण मानवता के पतन का द्योतक।
संपूर्ण मानवता को अपनी गोद में लेकर पालने वाली वसुंधरा आज फिर मनुष्य के कृत्यों से काँप गयी। बूढी हो चली है शायद। अब और बोझ नहीं उठा सकती हमारे लालच का। इतना सामर्थ्य प्रकृति ने हर माँ को दिया है की वो अपनी संतान की उदरपूर्ति कर सके। परन्तु लालच का पेट? वो तो परमात्मा भी नहीं भर सकता।
खनिज माफिया धरती का सीना चीर रहे हैं तो भू माफिया पहाड़ काट रहे हैं। जंगल माफिया की वृक्षों पर गिद्ध दृष्टि है तो उद्योगों का नदियों से बैर। परिणाम भूस्खलन और भूकम्प।
संपूर्ण मानवता को अपनी गोद में लेकर पालने वाली वसुंधरा आज फिर मनुष्य के कृत्यों से काँप गयी। बूढी हो चली है शायद। अब और बोझ नहीं उठा सकती हमारे लालच का। इतना सामर्थ्य प्रकृति ने हर माँ को दिया है की वो अपनी संतान की उदरपूर्ति कर सके। परन्तु लालच का पेट? वो तो परमात्मा भी नहीं भर सकता।
खनिज माफिया धरती का सीना चीर रहे हैं तो भू माफिया पहाड़ काट रहे हैं। जंगल माफिया की वृक्षों पर गिद्ध दृष्टि है तो उद्योगों का नदियों से बैर। परिणाम भूस्खलन और भूकम्प।
आज (22-10-2014) जबलपुर में भूकंप के प्रत्यक्ष अनुभव से उपजी ये पंक्तियाँ...
पर्वत पेड़ नदी अरु जंगल
वसुंधरा के ये आभूषण
इनसे वंचित कर धरती को
मत फैलाओ तुम प्रदूषण?
हो तुम जिसकी गोद में खेले
आज उसी का करते शोषण
माँ अगर बंजर रह जाये तो
सोचो कैसे होगा पोषण?
धीर अब तक धरा धरणी ने
ना जाने चुक जाये किस क्षण
और समूची मानवता का
काल ना कर जाये भक्षण
समय रहते त्याग सको तो
लोभ अपना त्यागो तत्क्षण
ऋण अदा कर दो मिटटी का
वृक्षों का पुन: कर दो रोपण
© - प्रशांत सेठ
वसुंधरा के ये आभूषण
इनसे वंचित कर धरती को
मत फैलाओ तुम प्रदूषण?
हो तुम जिसकी गोद में खेले
आज उसी का करते शोषण
माँ अगर बंजर रह जाये तो
सोचो कैसे होगा पोषण?
धीर अब तक धरा धरणी ने
ना जाने चुक जाये किस क्षण
और समूची मानवता का
काल ना कर जाये भक्षण
समय रहते त्याग सको तो
लोभ अपना त्यागो तत्क्षण
ऋण अदा कर दो मिटटी का
वृक्षों का पुन: कर दो रोपण
© - प्रशांत सेठ

No comments:
Post a Comment