भूख !!!
ये भी कोई मर्ज़ है भला? ये कोई समस्या नहीं है, क्योंकि ये चुन चुन कर सिर्फ गरीबों को मारती है। महामारी तो उसको कहते हैं जो साउंड प्रूफ दीवारों को पार करके, हमारे वातानुकूलित कमरों तक पहुँच जाये। क्योंकि जीवन तो हम चंद दौलतमंद लोगों का ही मूल्यवान है, जो इस दुनिया के खुदा बन बैठे हैं। शेष तो प्रकृति की नैसर्गिक क्रिया है।
वास्तव में बीमार कौन है? वो जिसकी देह टूट रही है या वो जिसकी आत्मा ही नहीं है? सोचिये....
वो चीख नहीं सकते जो भूख से हारे हुये हैं
हम सुन नहीं सकते पत्थर के सारे हुये हैं
दीन-ओ-ईमान से महरूम हम दुनिया के खुदा
क्या करें के मर्ज़-ए-दौलत के मारे हुये हैं
© - प्रशांत सेठ
महरूम = वंचित
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