अभी कुछ दिन पहले एक शख्स का बयान आया कि 57 साल से मंदिर मस्जिद का मुकदमा लड़ने का पश्चाताप है उन्हें। मुकदमा वो लड़े, हिंदुओं की नाराज़गी को सहन किया, मगर मंत्री दूसरे लोग बन गये। यानि की ये सारी लड़ाई थी, भावनाओं को भड़का के, वर्ग विशेष के नेतृत्व की। मंत्री ना बन पाने का दुःख है। मंदिर मस्जिद के बनने टूटने की बात नहीं है। किसी की आस्था से खिलवाड़ की फ़िक्र नही है। फ़िक्र है तो सत्ता का ख्वाब टूटने की।
हमारी आपकी आस्था इन जैसे लोगों के लिए मात्र एक सीढ़ी है सत्ता तक पहुँचने की। जी हाँ ! हमारे अन्धविश्वास की मिटटी पर ही पलते हैं ये बबूल के पेड़। फिर चाहे इनका नाम कोई ....राम हो या कोई ....खान/ओबैसी। ये कोई मठाधीश हों या इमाम। कल कोई शौर्य दिवस मनायेगा तो कोई काला दिवस। मगर वो लोग कौन सा दिवस मनायें, जिनका मानना है की
"ज़र्रे ज़र्रे में खुदा का नूर है" या "कण कण में परब्रह्म परमात्मा है"
कमान-ए-मज़हब से नफ़रत का तीर छूटा जब
कोई मस्जिद टूटी या के मन्दिर टूटा तब ।
अक़ीदत के लिबास में सियासी भेड़ियों का
अधूरा इल्म है, चेहरा ज़हीनी झूठा सब ।।
(अक़ीदत = आस्था, इल्म = ज्ञान, ज़हीन = विद्वान)
मज़हब और सियासत के विनाशकारी गठजोड़ का परिणाम सीरिया और इराक में दिख रहा है। नफरत के इस सैलाब से हिंदुस्तान को बचाना है तो वक़्त आ गया है की हमारी आस्थाओं से खेलने वाले सियासी चेहरे और अधकचरे ज्ञान के अतिसार से पीड़ित छद्म धर्मगुरुओं को पहचान कर बेनकाब कर दिया जाये। इनके आध्यात्मिक अज्ञान की यही पहचान है कि धर्म की आड़ में ये नफरत फैलाते हैं या आपकी भौतिक लालसाओं को प्रलोभन देकर ठगते हैं।
इनको मिटाने के लिये ज़रूरी है मिटाना, अपने अंदर छुपी धर्मान्धता और अन्धविश्वास को, क्योंकि ...
मज़हब का सियासत से जब जब हुआ है संगम
दरख्ते अमन नफरत से सींचा गया उस मौसम ।
खड़ी हुई बंटवारे की दीवार जिसके सीने पे
रोता रहा सदियों तक फिर घर का वो आँगन ।।
© - प्रशांत सेठ
( दरख्ते अमन = सौहाद्र का वृक्ष)
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