दीपों का त्यौहार, वो भी इस घोर अँधेरी काली रात में। शायद यही सन्देश है एक दीप का कि जब अँधेरे घने हों तो आशा का दीप जलाये रखें, और यदि जीवन में प्रकाश है तो परोपकार की परम्परा बनाये रखें।
इसी भावना के साथ आप सभी इष्ट मित्रों, स्नेहीजनों को शुभकामनायें.....
शुभ दीपोत्सव
लड़ते लड़ते एक दीप से अंधकार कुछ यूँ बोला
कैसे लड़ोगे तुम मझसे, जलोगे कब तक बन शोला?
श्वांसों का तेल है जब तक, जलती संवेदना की बाती
कर्त्तव्य पथ पर उजियारा मैं, करता रहूँगा सुन साथी
बुझते बुझते दे जाऊँगा, पीढ़ियों को भी ये पाती
घोर अमावस में ही दीप से, मिलने लक्ष्मी है आती
सुख शांति समृद्धि भी, गीत उसी के है गाती
जो लड़ता है तिमिर से, निर्द्वन्द दीपक की भांति
निस्वार्थ कर्म की सुगंध जब, चहुँ ओर छा जाती
बल बुद्धि यश कीर्ति तब, चलकर आती है ख्याति
स्वयं जलकर औरों की शुभ, करता है जो दीवाली
दीप बनकर जलने वाला, बन जाता है अविनाशी
© - प्रशांत सेठ
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