स्त्रियां हो जाती हैं पत्थर
जब छली जाती हैं
पत्थर हो जाते हैं स्त्री
जब स्पर्श करता है प्रेम
किसी कठोर आवरण के अंतस में छुपी
कोमलता में
निहित रहती है उर्वरता
संभवतः यह संतुलन ही शर्त है
सृजन के बीज की
तभी तो
पुरुषत्व के यथार्थ में संरक्षित
स्त्री की कोमल कल्पनाएं
कर देती हैं सृजन
एक सृष्टि का
मगर जब
यथार्थ भटकता हो अनभिज्ञ
मन के संकल्पों से
या मन की कल्पनाओं को अस्वीकार हो
यथार्थ का बंधन,
तब बिगड़ जाता है प्रकृति का संतुलन
नष्ट हो जाती है उर्वरता
तुमने सुना होगा
भटकते हैं बहुत से पुरुषत्व के अहं
ठोकर खाते शिलाओं से
और बहुत सी निष्प्राण शिलाओं में
आज भी धड़कती हैं अहिल्याएँ
एक स्पर्श की प्रतीक्षा में
किसी मर्यादित पुरुषोत्तम के
© - प्रशांत सेठ
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