तबलीगियों, जिहादियों के समर्थक एक कलम के बेईमान शायर को समर्पित मुक्तक ...
बहर में लिख लिख के बहरे हो गए
आदमी के कितने चेहरे हो गए
मरहूम यूँ इंसानियत भी हो गई
अल्फ़ाज़ पे मज़हब के पहरे हो गए
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और ये सच्चे मगर मौन सेक्युलरों को चेतावनी भी, क्योंकि वो नहीं जानते वो क्या नहीं कर रहे। छद्म और एक-पक्षीय सेक्युलरों को कोई चेतावनी नहीं, क्योंकि वो हमेशा से जानते हैं वो क्या कर रहे हैं ...
नफरत फैली, तो आएंगे ज़द में सच्चे भी
बहन बेटी माँ बूढ़े जवां और बच्चे भी
रोक लो तुम खुद ही वहाँ मज़हबी जहालत
इधर मज़हबी ना हो जाएं कई अच्छे भी
© - प्रशांत सेठ
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