Monday, April 27, 2020

बुद्धम शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि।

बुद्धम शरणं गच्छामि - आध्यात्मिकता
धम्मं शरणं गच्छामि - धार्मिकता
संघं शरणं गच्छामि - साम्प्रदायिकता

लेख लंबा है परंतु आज के समय मे व्याप्त आध्यात्मिकता/धार्मिकता/साम्प्रदायिकता के भ्रम को चिह्नित करने का प्रयास है। इस लेख का संबंध लेखक के ज्ञानी अथवा आध्यात्मिक होने से ना जोड़ा जाए, क्योंकि यह अनेक विद्वजनों और मनीषियों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर है।

1. आध्यात्मिकता - बुद्धम शरणं गच्छामि

अध्यात्म आपके भीतर का जगत है और आध्यात्मिकता इसी अंतर्जगत की यात्रा का नाम है। आध्यात्मिकता वही है जो बुद्ध को विलास के महलों की परिधि से दूर दुर्गम वन की ओर ले जाती है। इस ज्ञान यात्रा का लक्ष्य उस सत्य की खोज है जो खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। कोई इसे आत्मतत्व के बोध की, तो कोई नश्वर-अनश्वर के भेद की तो कोई ईश्वरीय स्वरूप को जानने की यात्रा कहता है। अतः बंद आँखों से ध्यानावस्था में बैठकर ज्ञान की प्राप्ति और अपने स्वरूप का बोध आध्यात्मिक व्यक्ति का लक्ष्य होता है। अपनी पहचान से पलायन करने को आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं कहते। बल्कि अपनी छोटी सी पहचान को उस विराट में समाहित करने का नाम आध्यात्मिकता है। यदि सांसारिक पहचान मिट गई है तो द्वंद भी समाप्त हो गया होगा, और यदि जीवन में द्वंद शेष है तो अभी आध्यात्मिकता अपूर्ण है।आध्यात्मिक व्यक्ति का ना कोई मित्र होता है ना शत्रु। ज्ञान ही मित्र है और अज्ञान ही उसका शत्रु है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब अपूर्ण आध्यात्मिक व्यक्ति आँख खोलता है और सामने यथार्थ को खड़ा पाता है। ज्ञान को उपलब्ध होकर जो कुछ नश्वर या अज्ञान के रूप में जाना, वही सामने संसार बनके खड़ा है। यहाँ इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो कुछ भी परिवर्तन हुआ है वह आपकी अंतर्दृष्टि में है, बाहर जगत में नहीं। बाह्य जगत को आपके भीतरी परिवर्तन और ज्ञान से क्या सरोकार? मात्र अपने अज्ञान का नाश कर लेना, किसी अन्य पर कोई उपकार नहीं है। यह कर्म का जगत है और प्राप्त ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कर्म के रूप में सबके लाभ का विषय बने। यहीं से धर्म की उत्पत्ति होती है।

2. धार्मिकता - धम्मं शरणं गच्छामि
इस संसार के प्रति आपके कर्तव्य का नाम ही धर्म है; जैसे कि एक पिता, पति अथवा पुत्र के रूप में पारिवारिक धर्म, या जीविकोपार्जन के लिए व्यावसायिक धर्म, समाज के प्रति सामाजिक धर्म, राष्ट्रीय धर्म या प्रकृति के प्रति प्राकृतिक (मानव) धर्म। वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति अपने समक्ष अनेक अज्ञानियों को भी पाता है तो घृणा नहीं, सहानुभूति रखता है। यदि वास्तव में थोड़ा बहुत भी बोध जागा होगा तो इस सत्य से भली भांति परिचित होगा कि अज्ञानियों में भी उसी का अंश है, जिस चेतना अथवा आत्मा का दर्शन उसने अपने भीतर किया है। और इस बात की भी स्वीकृति होगी कि बोध होने से पहले वह स्वयं भी अज्ञानी ही था। ऐसे में एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति, अत्यंत धैर्य के साथ सामाजिक चेतना के उत्थान हेतु कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। तब धर्म ही बुद्ध को सघन वन से लौटाकर समाज में वापस ले आता है; जो कुछ पाया है, उसको बांटने। अतः भीतर से वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति आपको कार्मिक रूप से धार्मिक प्रतीत होता है।

कर्म के द्वारा जब सामाजिक चेतना को जागृत करने कोई तत्वज्ञानी प्रवृत्त होता है तो निश्चित रूप से उसका सामना अज्ञान के वशीभूत, लोभ, भय और मोह से ग्रस्त, अधर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों से होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि कर्मयोगियों ने, सामाजिक धर्म के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करने वाले अधर्मियों से, शास्त्र अथवा शस्त्र के बल पर धर्म युद्ध भी लड़े हैं। चीन अथवा अन्य उत्तरपूर्व देशों में बौद्ध संतों भिक्षुकों में प्रचलित मार्शल आर्ट क्या इस बात का प्रमाण नहीं है। महाभारत हो या कर्बला की जंग, ईसाइयों के क्रूसेड या गुरु गोविंद सिंह जी का खालसा, सभी संप्रदायों में धर्मयुद्ध के प्रमाण हैं। यह समाज और राष्ट्र के उत्थान के लक्ष्य लेकर चलने वाले धार्मिक व्यक्ति और निजी स्वार्थ में लिप्त अधार्मिक व्यक्ति के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष है।

3. सांप्रदायिकता - संघं शरणं गच्छामि
सम्प्रदाय अथवा पंथ (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, इत्यादि) का जन्म तब होता है जब अपनी विशेष उपासना पद्धतियों और मान्यताओं को लेकर कुछ लोग संगठित होते हैं। ईश्वर तक पहुंचने के या सत्य को जानने के अनेक मार्ग बताए गए हैं। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से किसी ना किसी सम्प्रदाय का होता ही है। उसको अपनी रुचि के मार्ग पर चलने का अधिकार भी है। यहाँ तक कि अनीश्वरवादी सम्प्रदाय का होने का भी अधिकार है। इसमें कोई बुराई नहीं है जब तक एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को कष्ट नहीं देता, या अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपने का प्रयास नहीं करता। जितने भी महात्माओं ने इस धरा पर जन्म लिया, और तत्कालीन संप्रदायों में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया, तो उनके अनुयायियों ने एक नया सम्प्रदाय बना लिया। यहाँ विशेष रूप से गौर करने वाली एक बात ये भी है कि किसी सम्प्रदाय अथवा धारणा का विरोध करते करते भी आप एक नए सम्प्रदाय को जन्म दे देते हैं। अतः स्वीकार करें या ना करें, प्रत्येक व्यक्ति साम्प्रदायिक भी होता है। इस सत्य से पलायन करके कोई समस्या नहीं सुलझने वाली। इसे स्वीकार करना ही समस्या के हल की दिशा में पहला कदम होगा।

अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ होने में कोई बुराई भी नहीं है। आपकी प्रतिबद्धता अपने सम्प्रदाय के प्रति होनी ही चाहिए। परंतु यदि आप अपने सम्प्रदाय के सच्चे हितैषी मित्र हैं, तो उसमें व्याप्त कुरीतियों और ऐसी मान्यताओं का विरोध करें जो दूसरों के कष्ट का कारण बनती हों और मानव धर्म के विरुद्ध हों। सार ये है कि आपके सांप्रदायिक होने में कोई बुराई नहीं है, परंतु आप अपने सम्प्रदाय से कृष्ण जैसी मित्रता रखिये, कर्ण जैसी नहीं; जिससे कि सम्प्रदाय के पतन और तदुपरांत विनाश को रोका जा सके।

© - प्रशांत सेठ

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