विराट समुद्र की गोद में
तैरती हुई एक छोटी सी मछली
ढूंढती है समुद्र का अस्तित्व
जैसे माँ की कोख में अंगड़ाई लेता जीवन
प्रश्न करता हो
माँ के ही अस्तित्व पर
और थककर एक दिन
छोटी सी मछली करती है घोषणा
"धर्म अफीम है"
और "ईश्वर एक अंधविश्वास"
उधर समुद्र सोच रहा है...
अपने अस्तित्व को सिद्ध करने
मुझे करना होगा खुद से अलग
इस प्यारी सी खूबसूरत मगर जिद्दी मछली को
लेकिन अपनी जीत से अधिक प्रिय है
मुझे इसका जीवन
और तब नकार कर खुद ही खुदको
समर्पण की कोख से
जन्म लेता है संसार में
विराट प्रेम
मगर अदृश्य और निराकार
© - प्रशांत सेठ
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