Friday, April 17, 2020

अनुरागी

मन भंवरे के भीतर जागा, मेरे जब जब राग
दुनिया के पुष्पों से पाया, मैंने बहुत पराग

प्रकृति से देखा जुड़कर तो
राग हुए उत्पन्न
अंतहीन अनुबंध में पड़कर
थे सब लोग विपन्न

मन सारथी अश्व इंद्रियां
जीवन का ये रथ
जन्म जन्म तक चलकर देखा
आसक्ति के पथ

इच्छाओं के वृक्ष थे झुलसे, देह के हिस्से आग
एक दिवस तो थम ही जानी, थी ये भागम भाग

हाथ मोह से छुड़ाके देखा
जिस दिन शिव की ओर
वैरागी ने पकड़ा दी तब
वैराग्य की डोर

ज्ञान सारथी अश्व थे चिंतन
लौकिक ना थी चाह
एक झलक उस क्षण देखी
मैंने विरक्ति की राह

पतझर पहले उतरा, तब उतरा जीवन में फाग
मन के भीतर जागा था तब, तुझसे ही अनुराग

दृश्यमान इस जगत को देखा,
देखा दृष्टा बनके
अपने इसके उसके भीतर
अंदर तू ही मन के

गुंजित थी मुरली की धुन
उसके मन कानन में
विष भी अमृत बन कर उतरा
तब मीरा के तन में

कर्म ज्ञान के पथ पे चलकर, मिला राग-वैराग
पथिक चलो अब भक्ति मार्ग पर, जागेगा वीतराग

© - प्रशांत सेठ

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