डेढ़ माह का संयम आखिर
एक तलब में टूट गया
मदिरा के प्रिय आकर्षण में
राष्ट्र का वंदन छूट गया
अर्थशास्त्र ने पांसे फेके
धर्म द्यूत पे वार गए
अपनों के प्रति निष्ठारत थे
लेकिन संयम हार गए?
निष्फल हुई राम कथाएं
मर्यादा के पाठ भुलाए
मद्य की लहरों में हाये
गीता के सब श्लोक बहाए
रोक ना पाई ममता तुमको
ना रसोई की ही पुकार
ऐसे बंधन तोड़ के भागे
धन्य हो तुम हे पालनहार
पल भर का जो होश मिले तो
सोचो किस पथ चलते हो?
संस्कार अपने ही तजकर
भला किसे तुम छलते हो?
किए सदा अर्थ को अर्पित
तुमने जीवन मूल्य सभी
राजधर्म से चूके तुम भी
हे कौटिल्य के स्वप्न ऋषि
तुम्हें राष्ट्र का रथ सौंपा है
सारथी धर्म निभा पाओगे?
सिद्धांतों को ऐसे तज कर
विश्वगुरु की विभा पाओगे?
स्वप्न राष्ट्र गौरव के जिसके
सदा नेत्र में पलते हैं
सुनो सारथी, वर्तमान क्या
युग उसके पीछे चलते हैं
© - प्रशांत सेठ
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