प्रकृति के गर्भ में अपने जन्म की प्रतीक्षा में एक चिरपंथी की प्रार्थना ...
हे आदिशक्ति! हे जगजननी!
चलता रहा युगों से पर अब
रहा समर्थ ना चल पाने को
किसी वृक्ष की घनी छाँव में
ठहर गया तब सुस्ताने को
थकी देह कुछ क्षण बैठी पर
मन का पथिक नहीं रुक पाया
हे माँ! तेरे गर्भ में फिर से
यह चिर पंथी वापिस आया
सौंप पिता की गोद में मुझको
जिस क्षण तू मुस्काई थी
अमर सनातन जीव को फिर से
देह नयी मिल पाई थी
यही अधूरापन ही मुझको
फिर फिर दुनिया में लाया है
देह शेष, निःशेष कामना
जननी! ये कैसी माया है?
सोच रहा यह पथिक आज फिर,
बैठा बोध वृक्ष की छाँव
युगों युगों तक चलते चलते
थके नहीं इस मन के पाँव
गंतव्य क्या? अभी तो सच्चा
पथ ही नहीं दृष्टि में आया
पितृ मिलन की व्याकुलता में
क्षीण हुई अब फिर से काया
धारण किया गर्भ में प्रकृति
ने स्वरूप जो मानव तन का
सुप्त पड़ा क्यों मोह पाश में
अंश हूँ मैं ही जब चेतन का
कितने पथिक गए इस पथ से
विरला कोई समझ पाया है
मातृ कृपा बिन कब कब किसने
यहाँ शाश्वत जन्म पाया है
अपूर्णता को पूर्ण बना
अब अंश पुरुष का लौटा दे
परम पिता की गोद मुझे दे
प्रकृति तू फिर मुस्कुरा दे
मैंने चिरकाल से जागृत
शिव को प्रतीक्षित पाया है
हे आदिशक्ति! हे जगजननी, तू
जन्मदात्री महामाया है
© - प्रशांत सेठ

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