पुलवामा
हम हताश नहीं
हम निराश नहीं,
मिट जाएँ क्षणिक अंधेरों से
ऐसा हम प्रकाश नहीं
हम सूर्य नहीं जो
उदय होकर फिर अस्त हुआ
हम अंधकार से लड़ते जुगनू
जिनके सपनों को अवकाश नहीं
मानवता को कर कलंकित
लोभी शत्रु जब बढ़ते हैं
हम सीमा के रक्षक उसकी
छाती पर जा चढ़ते हैं
मृत्यु को भी वधू बनाकर
वरने से हमको संत्रास नहीं
हृदय में धधका अनवरत
राष्ट्रभक्ति का ज्वाल हैं हम
आज तिरंगा ओढ़ के निकले
भारत माँ के लाल हैं हम
राजतिलक चले ठुकरा कर
हमको अप्रिय वनवास नहीं
मातृभूमि के प्रहरी हम
हैं नींव राष्ट्र की गहरी हम
सोया हुआ देश जगाने
छोड़ के निकले देह-री हम
है नष्ट हमारी काया किन्तु
संबल का हुआ विनाश नहीं
यूँ तो शत्रु के लिए
प्रलयंकारी काल हैं हम
मगर तुम्हारे समक्ष खड़ा
अनसुलझा एक सवाल हैं हम
कुछ प्रश्नों का उत्तर लेकिन
है अपने भी पास नहीं
दुश्मन की संगीनें अपनी
छाती पर सम्हाले है
किन्तु पीठ सदा तुम्हारे
विश्वासों के हवाले है
घर में भी बैठे हैं शिखंडी
था हमको आभास नहीं
हम बाली से अधिक सबल
थे भीष्म प्रतिज्ञा से अटल
स्मृतियों में जिंदा रखना
हम होंगे ना यहाँ जब कल
मिले शहादत कर्तव्य पथ पर
इससे बढ़कर सन्यास नहीं
हम अंधकार से लड़ते जुगनू
जिनके सपनों को अवकाश नहीं
© - प्रशांत सेठ
No comments:
Post a Comment