प्रयाग
पर्वतों से गिरकर
विस्तार की तलाश में बहती
ये नदियां
होती हैं महत्वकांक्षाओं की तरह
एक दिन खो देती हैं अपनी मिठास
समा जाती हैं खारेपन में
क्योंकि
धाराएं बनाती हैं रास्ता
दो पाटों में बांटकर, धरा को
धाराएं ठुकरा देती हैं थिर को
और समेटना चाहती हैं आगोश में
वो सब कुछ, जो है जड़हीन
मैंने देखा है
सियासत के बंटवारे से प्रदूषित है
प्रेम की यमुना
लुप्त है नश्वर के मोह में पड़कर
सत्य की सरस्वती
और मैली हो चुकी है मन की गंगा
अपनी जड़ों को भूलकर
हे महामानव!!
सुना है
तुम भी उतरे हो पहाड़ों से
किसी महासागर की तलाश में?
© - प्रशांत सेठ
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