Tuesday, January 28, 2020

उठो शाहीन अब आँखें खोलो

भारत माँ की तरफ से अपने प्यारे मगर ढीठ बच्चों के लिए सुबह सवेरे वाली कविता। सोहनलाल द्विवेदी जी से क्षमा सहित 🙏🏼😄

उठो शाहीन अब आँखें खोलो
बहुत हुआ तुम घर को हो लो

दिल्ली में ना कमल दल फूले
तुम्हारा वोट बैंक ना झूले

गंदी हवा खूब फैलाई
बहुत मिली बिरयानी भाई

रुपये पाँच सौ खूब बंटे हैं
महीने भर से सब डटे हैं

राजनीति ने खेल खिलाया
तुमने खूब माल कमाया

नेताओं ने खाई मलाई
देश कहे बहुत दुःखदायी

देखो फिर से सर ना फूटे
EC (इलेक्शन कमीशन) का कहर ना टूटे

मोदी शाह की अजब माया
उकसावे में कोई ना आया

और ना अब तुम ज्यादा ऐंठो
मेरे प्यारे अब उठ बैठो

© - प्रशांत सेठ

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