कई शताब्दियों के वनवास के पश्चात और तमाम आसुरी प्रवृत्तियों को परास्त कर अंततः प्रभु श्रीराम अयोध्या लौट आए हैं। बाली का आहत हुआ अहंकार आज भी मन ही मन फिर वही प्रश्न कर रहा होगा। परंतु श्रीराम का उत्तर तो हर युग में वही होगा, क्योंकि सत्य तो कहा ही उसको जाता है, जो किसी भी देश काल परिस्थिति में अपरिवर्तनीय है।
मैं बैरी सुग्रीव प्यारा?
भेद ये मन का, खेल है सारा ।
जिसने सत्य को ना स्वीकारा ।
वरना निश्छल हृदय से मेरे,
बाली कभी नहीं था न्यारा ।
अपने भीतर मेरे अंश का,
तुमने तिरस्कार किया है ।
सब में भी अस्तित्व मेरा,
पर तुमने कब स्वीकार किया है ।
लघुता को अपने अंतस में,
जब भी अंगीकार किया है ।
अहंकार ने शत्रु रूप ही,
प्रभुता का स्वीकार किया है ।
मन की भ्रामक दृष्टि केवल,
निज स्वभाव का है विस्तार ।
त्याग सत्य को गढ़ा है तुमने,
कल्पनाओं का यह संसार ।
खुद से तुमने कब पूछा है,
क्यों दृष्टा का भाव नहीं है?
युग युग से क्यों निज दृष्टि में,
समग्रता का प्रभाव नहीं है?
चिंतन पर मकड़ी के जाले,
वहम रूप क्यों तुमने पाले ।
बोध वहां तक पहुंचे कैसे,
पड़े दृष्टि पर अहम के ताले ।
अनुभव रूप चित्त की वृत्ति,
ज्ञान रहित अनुभूति मन में ।
जन्म जन्म से संचित प्रारब्ध,
स्मृति शेष उस अवचेतन में ।
आत्म तत्व के रूप में मैं ही,
सदा सत्य का रहा हूँ प्रहरी ।
मन विकार का तभी तो बाली,
युगों युगों से मैं हूँ बैरी ।
भाव समक्ष जब मन का बाली,
शस्त्र अहम के तज पाएगा ।
बोध स्वरूप तभी जीवन में,
सदा मित्र बन राम आएगा ।
तुम भी प्रिय ज्यों अनुज तुम्हारा,
तुमको मैं नहीं, "मैं" ने मारा ।
फिर ना कहना कभी भूल से,
मैं बैरी सुग्रीव पियारा ।
© - प्रशांत सेठ

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