काव्योदय के साथियों ने आज एक मिसरा दिया
"अधूरी सी मोहब्बत है अधूरा प्यार जाने क्यूँ"
इस पर कुछ कहने की कच्ची सी कोशिश ....
अधूरी सी मोहब्बत है, अधूरा प्यार जाने क्यूँ
इधर एहसास का दरिया, उधर व्यापार जाने क्यूँ
तिरी यादों की लहरें क्या साहिल से हैं टकराई
समंदर हैं मिरी आँखें, भीगे अश्आर जाने क्यूँ
मिरी कोशिश रही छोटी, वही ऊंची ज़ियादा थी
हमारे दरमियां इक थी खड़ी दीवार जाने क्यूँ
मिरे हाथों में होकर भी मिरे हाथ ही नहीं आतीं
लकीरों पर मिरा इतना, नहीं इख़्तियार जाने क्यूँ
न मेरी है ज़मीं कोई, न मेरा है फलक ही वो
परिंदे सा मिला मुझको, अजब किरदार जाने क्यूँ
पसीने से जिसने अपने, ज़माने भर को पाला है
उसे ही रोटी की है अब, बड़ी दरकार जाने क्यूँ
© - प्रशांत सेठ
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