Saturday, September 26, 2015

अर्जुन

कर्ण से लेकर अर्जुन तक की यात्रा में प्रथम पड़ाव थी मेरी पूर्व रचना "कर्ण"। मेरा निवेदन है कि इस रचना को पढ़ने से पूर्व "कर्ण" को अवश्य पढ़ें।

http://prasantseth.blogspot.in/2015/09/blog-post_20.html

सच कहूँ तो झूठ नहीं लिखा था, परंतु सच भी पूरा नहीं लिखा था एवं जानबूझकर कुछ अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए थे। आशा थी कि गुणीजनों से ऐसे उत्तर मिल जायेंगे जो नकारात्मकता एवं पूर्वाग्रह से ग्रसित ना होकर, दोनों पक्षों के गुण-दोष का निष्पक्ष चिंतन करेंगे और मर्म तक पहुंचेंगे। बहुत अच्छी और श्रेष्ठ चिन्तनयुक्त प्रतिक्रियाएं मिली किन्तु फिर भी पूर्ण संतुष्टि नहीं मिली। तब मैंने सोच लिया की अब उत्तर भी वहीँ से लाऊंगा जहाँ से प्रश्न आये थे और मुझे विश्वास था की उत्तर अवश्य मिलेगा।

मैंने निवेदन किया था की कर्ण और अर्जुन की तुलना में कोई ना उलझे क्योंकि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। सच तो यह है कर्ण के बिना अर्जुन को समझा नहीं जा सकता। हम लोग (मैं भी) बड़ी जल्दी अपने अल्प ज्ञान से किसी के भी चरित्र की समीक्षा ही नहीं करते, वरन निर्णय भी सुना देते हैं। सच तो ये है की उस युग के तथाकथित अधर्मी भी इस युग के मनुष्यों से कहीं आगे थे ज्ञान में, कर्म में, बल में, बुद्धि में। अत: तुलना करनी ही है तो स्वयं से की जानी चाहिए। तब निर्णय सुनाने की बजाय कदाचित हम निर्णय लेना शुरू कर दें।

कर्ण और अर्जुन, दोनों के कर्म में कोई निजी स्वार्थ नहीं था। हाँ, कर्ण, भीष्म, द्रोण, आदि ने निज संकल्पों को धर्म से ऊपर रखा, इसलिए अधर्मी ना होते हुए भी संकल्पों एवं उपकारों से बंधे हुए, अधर्म की तरफ खड़े दिखाई दिए। इनको परास्त करने का सामर्थ्य अर्जुन में नहीं था। परंतु जिसमें सामर्थ्य था वह अर्जुन के साथ था। और वह अर्जुन के साथ क्यों था, इस पर चिंतन ही इस रचना का उद्देश्य है। फिर किसी भावुक कर्ण का दोहन ना हो और भावनायें सही जगह समर्पित हों ऐसा प्रयास है।

महाभारत आज किसके जीवन में नहीं है? जीवन में उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों में निर्णय लेते समय, यदि इन ग्रंथों से मार्गदर्शन लिया जाए तो संभव है हमारे आपके जीवन की महाभारत भी समाप्त हो जाए। समर्पण किसके प्रति हो? जीवन रुपी रथ पर, इन्द्रियों रुपी अश्वों की लगाम थामे, ईश्वर रुपी सारथी के प्रति या धृतराष्ट्र रुपी मोह और दुर्योधन रुपी लालसाओं के प्रति। सक्षम होते हुए भी तथा अधर्मी ना होते हुए भी यदि जीवन में पराजय है तो हमें अपने बंधनों को पहचान कर तोडना होगा। अपने अंदर के कर्ण को सही दिशा देनी होगी। मैंने अपनी अल्प समझ से गीता का यही सार समझा है।

मुझे विश्वास है की इस रचना को भी सराहना अवश्य मिलेगी, (शायद उतनी नहीं)। "कर्ण" ने यदि आपके ह्रदय को छुआ था तो "अर्जुन" आपके मस्तिष्क पर अवश्य चोट करेगी...

अर्जुन

कर्ण, तुम मेरे भ्राता भी हो, ज्येष्ठ भी
धनुर्धर, मुझसे कहीं अधिक श्रेष्ठ भी
मित्र मोह में किन्तु समझ सके ना मर्म को
उपकृत कौशल तुम्हारा समर्पित रहा अधर्म को

मेरे अपने संकल्प का यहाँ कोई अर्थ नहीं है
तुम्हें पराजित कर सकूं, मेरा सामर्थ्य नहीं है
तुम्हारे शौर्य, पराक्रम, दानवीरता का सदैव वंदन है
तुम्हारा शत्रु यह पार्थ नहीं, केवल निज मोह बंधन है

विश्वास, लक्ष्य, संकल्प जहाँ सब अर्पित हो
प्रभु चरणों में जिनका जीवन ही समर्पित हो
निज सामर्थ्य का नहीं कभी जो गीत गाते हैं
वो वानर भी, अजेय लंका को जीत लाते हैं

कृष्ण सा सारथी जिसके भी पास है
यश और कीर्ति सदैव उसकी दास है
वह सारथी नहीं है केवल मेरे रथ का
वह स्वयं धर्म है, मैं पथिक धर्मपथ का

पराजित अहंकार था मेरा, संकल्प भग्न था
मैं क्षत्रिय जब शस्त्र त्याग कर हुआ नग्न था
वह केशव था जिसने शस्त्र पुनः धारण किया
मैं नहीं, कृष्ण ने अधर्मियों का संहारण किया

क्रिया भी, कार्य भी, जो कुछ है प्रभु है
उस विराट के समक्ष निज अस्तित्व लघु है
मन, बुद्धि, अहंकार जिसके वशीभूत, वही सर्वस्व है
सवार तो सदा से वही है, यह अर्जुन मात्र अश्व है

मैं पराजित था जब तक स्वयं युद्धरत था
युद्ध उसका था, धर्म स्थापना जिसका व्रत था
नियति अधीन है उसके, वह कालजयी है
वरना कर्ण तो सदा विजयी था, विजयी है

हे कर्ण, जीवन मूल्यों का मैंने भी मान किया है
कुल और मित्र के समक्ष अहंकार का दान किया है
किन्तु धर्म, सत्य, मानवता पर संकट के क्षण में
भविष्य पर सदा बलिदान, निज वर्तमान किया है

आत्मा अनश्वर है, देह-बंधन माया है
मैंने यही गीता अमृत उससे पाया है
स्थूल दृष्टि से परे यही चित्र है कोई
ना शत्रु है कहीं, ना मित्र है कोई

मुझे सफल कहो, सबल कहो, ना समर्थ कहो
ना धर्म का पर्याय कहो मुझे, ना ही अर्थ कहो
युगों युगों तक वंदना केवल निष्काम कर्म की होगी
विजय कर्ण की ना अर्जुन की, सदैव धर्म की होगी

© - प्रशांत सेठ


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