बहुत दिन पहले देखा था इस प्यारी सी तस्वीर को। इसमें एक कविता छुपी सी दिखी तो तुरंत ज़हन में save कर लिया था। आज फिर आँखों के सामने ये तस्वीर आई तो मुस्कुराये बिना नहीं रह सका।
बचपन से लेकर अब तक की जीवन यात्रा आँखों में तैर गई। उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उपजते मनोभावों को व्यक्त करने की कोशिश में एक हलकी फुलकी रचना, अलग अंदाज़ में और बहुत ही सरल शब्दों में...
माँ मुझे आसमान छूना है
मुझे बढ़ना रात चौगुना
और बढ़ना दिन दूना है
शैशव मेरा रोया था
माँ, मुझे आसमान छूना है
मन भाग रहा मोटर सा
तन मगर अभी लूना है
बचपन मेरा कहता था
माँ, मुझे आसमान छूना है
कंधे तक अब आ गया हूँ
मगर ये तो सिर्फ नमूना है
लड़कपन मेरा ज़िद पर था
मुझे तो आसमान छूना है
कद तुमसे ऊंचा हुआ पर
बिना तुम्हारे सब सूना है
जवानी तड़प कर बोली थी
माँ की गोद में फिर सोना है
बचपन गाँव सा भोला था
अब जीवन मुम्बई-पूना है
उम्र थक कर कहने लगी है
मुझको फिर बालक होना है
...अब नहीं आसमान छूना है
© - प्रशांत सेठ
Concept is missing Prashant..... also not able to hold....
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