जन्म जन्मों से भटकते हुये मानव मन को त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने वाले और शीतलता प्रदान करने वाले गुरु चरणों में समर्पित ...
गुरुवर मेरे व्याकुल मन को, शीतलता अब पाने दो
पावन चरणों से तुम्हारे, आज मिलन हो जाने दो
ज्ञान ज्योति पाकर भी मैं, समझ सका ना उसका सार
व्याप्त था जीवन में मेरे, गहन अज्ञान और अंधकार
भक्ति के विस्मृत मेघों को, मन पटल पर अब छाने दो
गुरुवर ...
कामनाओं का गगन असीम, मैं उड़ता था पंख पसार
खूब किया मैंने अपनी, इच्छाओं के नभ का विस्तार
स्वप्न के पीछे उड़ता पंछी, साँझ ढले घर आने दो
गुरुवर ...
अश्रु भरे इन नयनों से ,बरस रहा है प्रेम अपार
भाव ह्रदय को पिघला कर, मथ रहा है बारम्बार
आज अविरल इन आँखों से, भावों को बह जाने दो
गुरूवर मेरे व्याकुल मन को शीतलता अब पाने दो
चरण अनुरागी
प्रशांत सेठ
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