आज कुछ यूँ ही... बेमक़सद सा
आँख से आंसू चुराकर "नम" लिखता हूँ
आग दिल में खुद लगाकर "बम" लिखता हूँ
जाहिल हूँ यकीनन मैं सुखन के फन में
मैं मैं मैं की दुनिया में "हम" लिखता हूँ
रफ्तारों के इस दौर में, अजब शख्स हूँ
ना जाने क्या सोचकर "थम" लिखता हूँ
ज़माना ढूंढता है दौलत में खुशियाँ
अपनी ये फितरत इसको "गम" लिखता हूँ
रिश्ते प्यार वफ़ा ईमां और इंसानियत
अब पुराने एहसासों को कम लिखता हूँ
और एक शेर व्यापम घोटाले से व्यथित होकर...
बात अच्छे दिनों की जब जब होती है
एक लफ्ज़ में तब फिर मैं "व्यापम" लिखता हूँ
© - प्रशांत सेठ
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