"मुझे आज तक समझ में नहीं आया के संसार ऐसा क्यों है, वैसा क्यों नहीं है। लोग इतनी सी बात को समझते क्यों नहीं हैं"
ये शब्द आपने अक्सर कुछ लोगों के मुंह से सुने होंगे। ये एक विशेष प्रकार की प्रजाति होती है जो स्वयं को इस संसार से अलग मानती है और प्रदर्शित भी करती है। ईश्वर ने उन्हें गलती से इस संसार में भेज दिया होता है क्योंकि उनके अनुसार वे पात्र तो किसी अन्य उत्कृष्ट लोक के होते हैं। बहुत घुटन होती है उन्हें इस संसार में। अपने चारों तरफ उन्हें कोई भी अपने समकक्ष नहीं मिलता। अंत में अवसाद लेकर इस संसार से जाते हैं। निश्चित है ऊपर जाकर भी शिकायत ही करते होंगे।
हम कोई अपवाद तो हैं नहीं। आपको ऐसे लोग मिल सकते हैं तो हमको क्यों नहीं? ऐसे ही एक सज्जन सुबह सुबह टकरा गए। मन ही मन कुछ हमदर्दी और उजागर शुभकामनाओं के साथ विदा किया। अब आप पूछेंगे की हमदर्दी भी कोई मन ही मन देने की चीज़ है? तो हम कहेंगे की मेरे भाई, जिसे स्वयं के रुग्ण होने का पता नहीं है, वो हमारी हमदर्दी क्यों लेगा?
चिंतन करना मेरा स्वाभाव है। उद्देश्य है स्वयं के अंदर निरंतर सुधार का प्रयास। इसलिये इस दर्पण में सबसे पहले अपना चेहरा देखा तो पाया कि कभी हम भी तो ऐसे ही थे। जब तक सिर्फ दूसरों को पढ़ते रहे तब तक शिकायतों से भरे रहे। अब जब दूसरों के पहले खुद को भी पढ़ते हैं तो अपनी कमियों के प्रति सजगता बढ़ती है। परिणाम आनंद शांति और प्रेम के रूप में मिलता है। और इससे बड़ी सफलता क्या होती होगी?
इस बार विजयादशमी पर भीतर ही कुछ जल जाये तो क्या बुरा है। देखिये, ये रचना शायद आपके भी किसी काम की हो...
अहंकार
विद्वता का चोला ओढ़े
कब चुपके से तुम आ गये
मेरे मन मंदिर के भीतर
चोरी चोरी समा गए
कभी पर्वत सा वृहद लेकर
कभी राई सा लघु आकार
क्रोध घृणा है द्वेष मोह भी
अनंत तुम्हारे हैं प्रकार
दस चेहरे तुम ही रावण के
तुम ही राम का हो वनवास
सूर्पनखा का दर्प तुम ही हो
तुम ही सीता का संत्रास
लेकिन मैं पहचान रहा हूँ
बदलो तुम कितने भी रूप
तुम ही कभी छाँव हो और
कभी तुम ही बन जाते धूप
भ्रम के अदृश्य आवरण से
अवरुद्ध करते ज्ञान की राह
भटकाते हो मन को तुम ही
देकर झूठे मान की चाह
सहज सुंदर जीवन में
विशिष्टता का भ्रामक स्वाद
फिर कुंठाओं का रूप लेकर
तुम ही बन जाते अवसाद
भरा घट लेकर मेघों से
करते हो वर्षा की आस
चलो जरा रीत भी जाओ
खाली होकर आओ पास
मन भीतर से खुद पूछेगा
प्रकाश रखूँ या अंधकार?
सागर मिलन की प्यास रखूँ
या पृथक बूँद का अहंकार?
© - प्रशांत सेठ
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