Thursday, October 15, 2015

एक पाती (वित्त) चोर के नाम


मेरे एक प्यारे से मित्र हैं। हास्य कवि हैं, उसपर से सरदार भी। उनकी कोई फैक्टरियां भी नहीं हैं और बाप दादों ने भी दिल खोल के दिया तो है, लेकिन केवल आशीर्वाद।

उनके घर कल रात चोरी हो गई। पहले तो दुखी हुए; बताया की जीवन भर की जो थोड़ी बहुत जमा पूँजी थी वो चली गई। फिर हंसने लगे। मुझे भी हंसी आ गई; अब एक कवि के घर सरस्वती ही रह सकती है, लक्ष्मी कहाँ ठहरती है। वित्त चला गया तो जाने दो, चित्त ना जाने पाये।

भीगा होगा अंतर्मन जिसका
वही तो मुस्कुराता है
मुझे मालूम है वो रोया होगा
जो सबको हंसाता है

द्रवित ह्रदय ने फिर एक रचना को जन्म दे दिया ....

एक पाती (वित्त) चोर के नाम

उम्मीदें थीं कल की इसमें
कुछ बूँदें थीं पसीने की
कुँवारे जेवर थे बहन के
बेटी की फीस महीने की

लटक रही पीले पत्ते सी
एक आशा की डाली थी
बीमार माँ की थीं श्वांसें
दवा की शीशी खाली थी

बच्चों से किये वादे इसमें
जो अभी तक अधूरे थे
बहुत नहीं था अलमारी में
लेकिन सपने पूरे थे

फिर भी सब कहाँ था उसमें
भावों का गंगाजल नहीं था
रब की उसमें दुआ नहीं थी
और धीरज का बल नहीं था

कुछ ज़रूरत थीं जीवन की
मुश्किलों का हल नहीं था
असली धन तो छोड़ गए तुम
साहस और संबल नहीं था

यही सोच मैं दुआ देता हूँ
तुम्हारी भी तो बेटी होगी
बूढ़ी माँ होगी बिस्तर पर
जो बीमार सी लेटी होगी

ऐसी कोई मजबूरी जो
शायद मुझसे बड़ी होगी
सर उठाये ज़रूरत कोई
द्वार तुम्हारे खड़ी होगी

मगर जीवन यज्ञ में सुन लो
निज श्रम का ही फल मिलता है
खुशियों का कोई फूल कहाँ
रेगिस्तानों में खिलता है

इसलिये मेरी इस पाती को
पवित्र ह्रदय से पढ़ना तुम
चरित्र आँगन के फूलों का
संस्कारों से गढ़ना तुम

ईमान का कुछ धन लेकर
बेटी की फीस में मिला देना
बूढ़ी माँ को मेहनत की भी
दो बूँद ज़रूर पिला देना

© - प्रशांत सेठ


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