Wednesday, October 14, 2015

बचपन

सफल लोग बताते हैं की जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन मैं इन सफल लोगों से सहमत नहीं हूँ। कभी कभी पीछे मुड़कर देख लेने से बहुत कुछ ऐसा मिल जाता है जो जीवन की रफ़्तार में छूट गया है....

बचपन

बचपन वाले पंख लगाकर
उड़ने को बस है तैयार
चला आज फिर सपने लेकर
मन पंछी बादल के पार

स्मृतियों के झरोखे से
अतीत झाँक रहा इस पार
इक सुंदर थी राजकुमारी
इक सुंदर था राजकुमार
चला आज फिर....

फूलों से लेकर खुशबू
तितलियों से रंग हज़ार
हवाओं के साथ मिलकर
महकाते थे हम संसार
चला आज फिर....

रूठना फिर मान जाना
ज़रा देर की वो तकरार
ना ह्रदय में गांठ कोई
ना रिश्तों में अहंकार
चला आज फिर....

ना किसी की जीत ही थी
ना किसी की थी तब हार
संघर्षों से परे ह्रदय में
पलता था बस निश्छल प्यार
चला आज फिर....

मित्रता में स्वार्थ नहीं था
ना क्षमा थी ना आभार
इक पल में बह जाता था
नयनों से ह्रदय का ज्वार
चला आज फिर....

समझ नहीं ज्ञान नहीं था
दायित्वों का ना था भार
छोटी छोटी ख़ुशी बड़ी थी
छोटा सा दुःख था अपार
चला आज फिर....

मिट्टी की गुल्लक में रखे
सपनों का फलता व्यापार
हमसे बड़ा धनिक नहीं था
इच्छाओं का न था विस्तार
चला आज फिर....

मुस्कानों पे शर्त नहीं थी
मुक्त थी आंसुओं की धार
उत्सव था जीवन सारा
हर दिन था जैसे त्यौहार
चला आज फिर....

बचपन में नादानी थी
समझ पड़ी थी लाचार
मुड़कर देखा तो पाया कि
छूट गया जीवन का सार
चला आज फिर....

© - प्रशांत सेठ

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