काव्योदय में आज के मिसरे से प्रेरित एक ग़ज़ल। मिसरा था...
"कभी दिल से ज़रा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे"
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न काबा में न काशी में मुझे क्या यार पढ़ लोगे
कभी दिल से ज़रा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे
न जाने खोजते हो क्या सदा औरों की सीरत में,
कि खुद को पढ़ लिया जिस दिन तो तुम संसार पढ़ लोगे
ज़रा डुबो कभी इसमें ये जीवन मौजे दरिया है
किनारों पर यूँ ही रहकर भला क्या धार पढ़ लोगे
ज़रा साँसों को तरसो और लो गहराई में डुबकी
कज़ा क्या है ज़रा इस पार से उस पार पढ़ लोगे
कभी जब वक़्त होगा ज़ीस्त की दौलत लुटाने का
अमानत थी किसी की ये तुम्हें उधार पढ़ लोगे
तुम्हारे हाथ में हैं गढ़ लो खुद तकदीर तुम अपनी
लकीरें जब पसीने से धुलेँगी सार पढ़ लोगे
सफीना हौसले का हो, रहे पतवार रहमत की
बहुत छोटी सी है मुश्किल की ये मझधार पढ़ लोगे
गुमाँ ताउम्र था हो वस्ल तुमसे आज ही शायद
गुमाँ ही था कि तुम आँखों में इंतज़ार पढ़ लोगे
चलो अच्छा ही है जो बाख़बर हो तुम ज़माने से
खबर जब साया होगी "सेठ" की, अखबार पढ़ लोगे
© - प्रशांत सेठ
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