Friday, October 2, 2015

अपना अपना गांधी

गांधी जब तक एक दर्शन है तब तक वंदनीय है। मगर जहाँ केवल प्रदर्शन (दिखावा) बनकर रह गया है, वहां निंदनीय हो जाता है। दुनिया में राजनीतिक स्वार्थ और अपूर्ण समझ ने ऐसे कितने ही दर्शन और चिंतन को विकृत रूप दिया है तो गांधी कौन सा अपवाद हैं।  इस दर्शन को अपनाने के बजाय केवल प्रदर्शन तक सीमित हो जाने की वजह से इसकी गहराई को समझ पाना सबके लिए संभव नहीं है। इसको वही जान सकता जिसने गांधी जी के आत्मबल को धारण किया होगा। बलहीनों को भी अपने अधिकार के लिये संघर्ष करने का जो तरीका गांधी ने दिया है, उसके सामने दुनिया आज भी झुकती है; लेकिन तब ही जब इस प्रक्रिया को पूरी तरह आत्मसात किया जाए।

लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूँ। यह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं है, वरन एक मानसिकता पर है। और समर्थन है एक दर्शन का। एक पुरानी रचना जो आज भी पुरानी नहीं है...

अपना अपना गांधी

गांधी वो जो है नोट पर
या वो जो जिया लंगोट पर

गांधी वो जिसकी तस्वीर दीवारों पर
या वो जिसका प्रभाव है विचारों पर

गांधी वो जो स्वयं में एक दर्शन है
या वो जो खादी में कोरा प्रदर्शन है

गांधी वो चरखा जिसका स्वाभिमान है
या वो जो चर के खा रहा हिंदुस्तान है

गांधी वो जो दफ़न है राजघाट में
या वो जो है सत्ता के ठाट बाट में

मुझे नहीं मालूम तुम्हारा गांधी कौन है
मेरा गांधी तो शर्म से मौन है

फिर भी तुम सबको बधाई हो
शायद तुमने भी गांधी जयंती मनाई हो

खैर जाने दो अपना अपना सबका गांधी है
मेरा तो चला गया गुजरी हुई आंधी है

तुम्हारा वही है ना?
जिसके चेलों की आज भी चांदी है

© - प्रशांत सेठ


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