बड़े भाई सूरज राय "सूरज" जी के जन्मदिन पर कुष्ठ आश्रम में 'तेरा तुझको अर्पण' करने का सौभाग्य इस वर्ष मुझको भी मिला।
भूख, मुफलिसी अपने आप में बड़ा रोग है। उस पर से गलते हुये हाथ पाँव यानी तिल तिल मरना। दुआयें देने के लिये इनके हाथ भले ही सलामत नहीं थे मगर इनके आंसुओं में दर्द भी था और दुआ भी। आज हम लोग वही समेट लाये झोली भर के। जो दे पाये वो बहुत थोडा था और ज़रूरत कहीं ज़्यादा बड़ी थी।
टूटे हुये टपरे में टपकती हुई बूंदों के बीच, सूरज का इंतज़ार (और ज़रूरत) जितना इनको था, उतना शायद किसी और को नहीं होगा। बारिश की बूँदें तो थम जायेंगी मगर आँखों की बरसात कब थमेगी, ये नहीं मालूम। बेबसी और लाचारी के ये आंसू देखकर यूँ लगा जैसे...
भूखों को उम्मीद दो कौर मिल गई
चंद लम्हात की दौलत और मिल गई
कह दो मौत से के ठहरे ज़रा अभी
मुट्ठी भर ज़िन्दगी इन्हें और मिल गई
© - प्रशांत सेठ
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