मित्रों के साथ सपरिवार वृक्षारोपण ....
एक प्यारा सा इतवार
कुछ गड्ढे खोदे, कुछ विकार
कुछ पौधे रोपे, कुछ संस्कार
भावों के जल से सींच आज को
रच लिया कल का संसार
कुछ धूप सही, कुछ भूख सही
श्रम की भी थोड़ी बूँद बही
सूरज ने तब कहा हँसकर
वृक्ष नहीं तो तुम ही नहीं
खिलते पल्लव पुष्पों ने जाना
अपने जीवन का आधार
धूप में समझा महत्व छाँव का
शहर ने समझा अर्थ गाँव का
स्वस्थ जीवन की राह में सबने
समझा मतलब श्रम के पाँव का
बचपन ने सीखा यहाँ आकर
प्रकृति को देना आभार
इतना दोहन हम करते हैं
लौटाने से मगर डरते हैं
धरती के इस कर्ज की पहली
चलो आज हम किस्त भरते हैं
मेघों ने भी किया बरसकर
समग्र परिश्रम को स्वीकार
मन की अपनी भूख प्यास का
लक्ष्य ना हो सिर्फ निज विकास का
आज भविष्य को अर्ध्य देते हैं
वर्तमान के लघु प्रयास का
इसी सोच के साथ बीता
एक प्यारा सा इतवार
© - प्रशांत सेठ

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