Friday, March 8, 2019

एक अपूर्ण कविता

स्त्री क्या है
और क्या नहीं
शायद वो खुद भी नहीं जान पाई
इसलिए होती रही परिभाषित
कवि से, उपासकों से
और शोषकों से

ईश्वर भी स्वयं की तलाश में
रच बैठा संसार
और होता रहा परिभाषित
ज्ञानियों से, उपासकों से
और शोषकों से

"मैं"
साध्य को साधन समझ
उलझा हूँ आज भी
अपने अनुरूप
एक नई परिभाषा गढ़ने में

© - प्रशांत सेठ


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