और क्या नहीं
शायद वो खुद भी नहीं जान पाई
इसलिए होती रही परिभाषित
कवि से, उपासकों से
और शोषकों से
ईश्वर भी स्वयं की तलाश में
रच बैठा संसार
और होता रहा परिभाषित
ज्ञानियों से, उपासकों से
और शोषकों से
"मैं"
साध्य को साधन समझ
उलझा हूँ आज भी
अपने अनुरूप
एक नई परिभाषा गढ़ने में
© - प्रशांत सेठ
No comments:
Post a Comment