Friday, March 1, 2019

ठेठ वाणी - 1

यूँ तो मैं व्यक्ति आधारित राजनीति का पक्षधर नहीं हूँ, क्योंकि स्थायी समाधान के लिए विचार का स्थापित होना जरूरी है। परंतु ये भी सत्य है कि दृढ़ विचारों का वाहक दृढ़ व्यक्तित्व ही होता है। अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति की एक उम्र होती है, परंतु विचार अमरत्व का वरदान लिए होते हैं, जो सृष्टि के अंत तक साथ चलते हैं। व्यक्तियों के पीछे चलने वाली उन्मादी भीड़ से आप विचारों का वाहक बनने की आशा नहीं कर सकते। इसलिए जो लोग व्यक्ति से प्रेम करते हैं, उनकी अपेक्षा मुझे वे लोग अधिक प्रिय हैं जो उस व्यक्तित्व के विचारों से प्रेम करते हैं और अपनाते हैं।

इस देश ने दस साल तक महा मौन रखा था। किसी की मृत्यु पर दो मिनट का मौन रखा जाता है, परंतु तब तो लोकतंत्र की मृत्यु हुई थी। ये निश्चित है कि इस महा मौन के बाद वाक तूफान तो आना ही था। ये प्रकृति का नियम है। ये भी उतना ही निश्चित है कि तूफान के बाद शांति होगी। व्यक्ति केवल निमित्त है।

लोग कह रहे हैं कि शहीदों की शहादत को वोट अर्जन का साधन बना लिया गया है। निश्चित ये दुःखद है; परंतु वोट तो जनता देती है; तो क्या विपक्षी ने भी चुपके से मान लिया कि युद्ध से वोट मिलेंगे? हाँ क्योंकि वो जानते हैं, वोट युद्ध को नहीं, दृढ़ता को मिलेंगे। इससे पहले भी जनता ने 1971 के बाद दृढ़ता को ही चुना गया था। आतंकवाद ने कुकर्म पहले भी किए हैं, परंतु उसकी नाक में नकेल बहुत वर्षों पश्चात डाली गई है।

दूसरा पहलू ये भी है कि कोई जवानों की लाश पर राजनीति कर रहा है तो कोई मासूम नागरिकों की लाश पर करता रहा। चाहे वो कश्मीर में हिंदुओं की हत्या और पलायन हो, या गोधरा हो, या मुम्बई अटैक, इत्यादि हो।

बुद्ध के देश में युद्ध किसी को प्रिय नहीं होता। परंतु ये बात नकारी नहीं जा सकती के आतंकवाद के जरिये विश्व पर आधिपत्य की कामना लिए एक वर्ग विशेष युद्ध को ही धर्म समझ रहा है। तब हमारे भीतर के बुद्ध को युगों तक जीवित रखने के लिए जंग का नाम ही महाभारत है। जिसका सिद्धांत मात्र इतना है कि आने वाली पीढ़ियों को शांति उपलब्ध कराने के लिए, शांतिप्रिय लोगों का जीवित रहना आवश्यक है। अतः बाहर चल रहे युद्ध का भीतर की शांति से गहरा संबंध है, प्रबुद्ध लोगों के जीवन में। मानवता, अहिंसा, दया, निष्ठा को मजबूत काँधों पर ही ढोया जा सकता है। पिलपिली जिव्हा पर ये गुण बहुत दूर नहीं जा सकते। मगर तुम यही करते रहे; कदाचित इसीलिए गाँधी के इस अहिंसात्मक और सत्यवादी देेश ने जितनी हिंसा, बेईमानी और मक्कारी का अनुुुभव किया हैै, उतना विश्व में शायद ही किसी और राष्ट्र ने किया हो। ध्यान रहे, प्रकृति भी कोमल बीजों को कठोर आवरण प्रदान करती है।

- प्रशांत सेठ


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