Wednesday, September 11, 2019

शतरंज का खिलाड़ी

तुमने भी खेला होगा ये खेल
कभी काले
तो कभी सफेद मोहरों से
और चखा होगा स्वाद
हार का भी, जीत का भी

आमने सामने डटी दो सेनाएं
अपने अपने अहंकार की
मन के चौंसठ खानों की बिसात पर
काम क्रोध मद लोभ रूप
हाथी घोड़े ऊँटों से सुसज्जित
प्रतिद्वंदी से युद्ध को तत्पर

अधर्म के पासों से, जीत के प्रयास में
तुमने भी दाँव पर लगाई होगी
धर्म की द्रौपदी
तुम्हारी ज्ञान इंद्रियों ने भोगा होगा
जन्म, फिर पुनर्जन्म का लम्बा वनवास
मन की सौ इच्छाओं के चक्रव्यूह में
तुम्हारी समझ का अभिमन्यु
मरा होगा कई बार

एक बार फिर से खेल कर देखना
इस बार दोनों तरफ से ....
खुद ही खुद का प्रतिद्वंदी बनकर
चलना चालें, अपने ही विरुद्ध
फिर सोचना
कौन जीता और कौन हारा?

शायद तुम समझ सको
कुरुक्षेत्र के मैदान में बिछी
शतरंज की बिसात को
और पहचान पाओ उस खिलाड़ी को
जिसने कहा था
"मैं" ही मरता हूँ
"मैं" ही मारता हूँ

शायद अबकी बार
सारे द्वंद भूलकर
खेलना सीख जाओ तुम भी
संसार के कुरुक्षेत्र में
जीवन की शतरंज

© - प्रशांत सेठ


No comments:

Post a Comment