Tuesday, October 22, 2019

गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल

घर के बाहर
गीला-सूखा कचरा समेटे
दो डस्टबिन, हरे और नीले
बैठे रहते हैं तुम्हारी प्रतीक्षा में
मेरे घर की पवित्रता, ऋणी है तुम्हारी

लेकिन
हृदय की दहरी के भीतर
मेरे मन का गीला-सूखा कचरा
अब भी गंधाता है समाज को
इसे नहीं ले जाता कोई गाड़ीवाला

काश!
हमेशा खुला रहे
हमारी समझ का द्वार
हमारी दृष्टि जाए
अहं के दरवाजे से बाहर
हमारे मन का हो विस्तार
स्वार्थ की चौखट के उस पार भी
हमारे हृदय में समा जाए
क्षितिज के इस छोर से उस छोर तक
समूचा संसार

तब शायद
हम भी करने लगें प्रबंध
अपने नकार का

मैंने सुना है
कुछ लोग बना लेते हैं
मन के गीले-सूखे कचरे से खाद
फिर उगाते हैं फूल, जीवन की बगिया में
और महक जाता है उनका घर
भीतर भी, बाहर भी

© - प्रशांत सेठ


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