गुरु की वाणी में कल कल
धार गंगा सी बहती है
चारों वेद अठारह पुराण की
बात यहीं तो रहती है
सतयुग में हरिश्चंद्र ने
गुरु को ही सर्वस्व दिया
त्रेता में रामचंद्र ने फिर
मर्यादा को प्रशस्त किया
द्वापर की तो बात कहें क्या
केशव की बलिहारी है
गुरु का ध्यान धरे हृदय में
स्वयं कृष्ण मुरारी है
कलिकाल का नर्तन देखो
धर्म कहाँ विलुप्त हुआ
लोभ विलास में पड़े मानव
ज्ञान भी ऐसा सुप्त हुआ
पापों का है वेग प्रचंड
बुद्धि इनसे हारी है
गुरु चरणों की सेवा ही
इस युग में तारणहारी है
किस दिशा में चलते हम हैं
लक्ष्य का हमको ज्ञान नहीं
सत्य को क्या जानें जबकि
स्व का हमको भान नहीं
परम सत्य के पथ पर उसकी
चलने की तैयारी है
गुरु शरण मे रहकर जिसने
दृष्टि भीतर उतारी है
अहं अपना कर समर्पित
गुरु चरणों को लीजे थाम
पथ का आनंद ना रोके तो
दूर नहीं है परम धाम
भक्ति भाव से श्रद्धा जिसने
गुरु पर अपनी वारी है
उसकी नैया भवसागर की
लहरों से कब हारी है?
© - प्रशांत सेठ
No comments:
Post a Comment