मैं बहुत समझाता हूँ मगर
तर्क करती है
अब नहीं बहलती किताबी ज्ञान से
समझने लगी है यथार्थ
मैं समझाता हूँ प्रेम
तो करती है प्रश्न अस्तित्व पर
प्रेम के लिए अनिवार्य है अस्तित्व
मैं समझाता हूँ
"अहिंसा परमो धर्म:"
कहती है
"धर्म हिंसा तथैव च:"
मैं समझाता हूँ "वसुधैव कुटुम्बकम"
वह कहने लगी है
"धर्मो रक्षति रक्षितः"
मैं जगाना चाहता हूँ
श्रद्धा और विश्वास
वो दिखाती है
इतिहास के आईने में
पीठ पर निशान "विश्वासघात" के
मैं सुनाता हूँ किस्से, देता हूँ दिलासा
पाप बढ़ने पर, ईश्वर के अवतार के
कहती है, अवतरित है सदा से
मेरे भीतर मेरा ईश्वर
मैं बहुत समझाता हूँ मगर
अब नहीं आती छलावे में
"धर्म निरपेक्ष" जैसे छद्म शब्दों के
सावधान!
अब यह मेरे बस की बात नहीं
तुम्हारी भी जिम्मेदारी हो चली है
मेरी "सहिष्णुता"
अब सयानी हो गई
जवाब देने लगी है
अब सयानी हो गई
जवाब देने लगी है
© - प्रशांत सेठ

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