छुट्टी का दिन किसे अच्छा नहीं लगता। घर में परिवार के साथ फुर्सत का एक दिन नयी ऊर्जा दे जाता है। इस इतवार का इंतज़ार हफ्ते भर रहता है।
हम और आप सौभाग्यशाली हैं क्योंकि ये इंतज़ार सबको नहीं रहता। एक पिता जिसके अरमान जेब की गुंजाईश के सामने दम तोड़ते हों, उसे बिलकुल नहीं रहता। एक गरीब बाप जिसे आज भी रोटी का इंतज़ाम करना हो, उसे भी नहीं रहता। ऐसे भी लोग हैं जो बच्चों से मुंह चुराकर सुबह से निकल जाते होंगे। या फिर बहला देते होंगे मासूम ख्वाहिशों को नये नये बहानों से। या फिर बचपन का गला घोंट देते होंगे एक थप्पड़ से और गाल को सहलाता हुआ बचपन अचानक समझदार हो जाता होगा।
देखिये इतवार का एक रूप ये भी है...
आज फिर दिन है सब्र की आज़माइश का
आज फिर दिन है बच्चों की फरमाइश का
गम-ए-मुफलिस आ गया फिर इतवार की सूरत
आज फिर चेहरा उतरा है मेरी गुंजाइश का
© - प्रशांत सेठ
मुफलिस = गरीब
गुंजाइश = हैसियत
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