जीवन में स्वछंदता को रोकने के लिये ही शायद समाज का, रिश्तों का जन्म हुआ है। मन की अनंत इच्छाओं के वेग में कई बार ये बंधन बोझ लगने लगते हैं। परन्तु इनका महत्व वही जानता है, जिसने इन्हें खो दिया है।
डोर अर्थात बंधन। यानी अनुशासन, मर्यादा, परस्पर प्रेम, सम्मान, विश्वास, आदि आदि। पतंग की भांति जीवन मूल्यों की डोर से बंधकर जीने वाले, कभी दिशाहीन होकर नहीं भटकते।
और जो स्वछन्द होकर भटकना चाहते हैं उनके लिये....
राब्ता डोर से रख, लीजिये मज़ा ऊंचाई का
ख़ाक मज़ा है तर्क-ए-ताल्लुक की रुसवाई का
चीथड़े जिस्म-ओ-जज़्बात के कर देगा ज़माना
पूछियेगा अंजाम कभी पतंग से बेवफाई का
© - प्रशांत सेठ
राब्ता = रिश्ता
तर्क-ए-ताल्लुक = सम्बन्ध टूटना
रुसवाई = बदनामी
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